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क्रिया क्या है? क्रिया के भेद, संरचना, क्रिया के प्रयोग

क्रिया वे शब्द होते हैं जो किसी कार्य के होने या करने अथवा किसी व्यक्ति या वस्तु की स्थिति का बोध कराते हैं।

एक क्रिया एक शब्द है जो एक शारीरिक क्रिया (जैसे, “ड्राइव”), एक मानसिक क्रिया (जैसे, “सोच”), या होने की स्थिति (जैसे, “अस्तित्व”) को इंगित करता है। प्रत्येक वाक्य में एक क्रिया होती है। संज्ञा या सर्वनाम क्या कर रहा है, इसका वर्णन करने के लिए क्रियाओं का उपयोग लगभग हमेशा संज्ञा या सर्वनाम के साथ किया जाता है।

क्रिया क्या है?

जिन शब्दों से किसी कार्य के करने या होने का भाव प्रकट होता है, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे – पढ़ना, लिखना, सोना आदि।

प्रत्येक वाक्य में क्रिया का होना आवश्यक होता है। हिन्दी भाषा में क्रिया वाक्य के अन्त में आती है। कुछ वाक्यों में एक से अधिक क्रियाएँ भी होती हैं।

उदाहरण –

  1. वह सितार बजा रहा था। (कार्य होने का बोध)
  2. बारिश में छत गिर गयी। (घटना के होने का बोध)
  3. टोकरी स्टूल पर है। (वस्तु में अस्तित्व का बोध)

ध्यान दीजिए

माँ ने पूछा – “इतनी देर तक कहाँ थी?” बेटी —“प्रिया के घर।”

यहाँ दूसरे वाक्य में क्रिया नहीं है, फिर भी यह वाक्य पूर्ण है। कई बार वाक्य में क्रिया छिपी रहती हैं। यह वाक्य इस प्रकार पूर्ण होगा।

बेटी – “प्रिया के घर थी।”

इस प्रकार, क्रिया की परिभाषा में दो तत्व दृष्टिगोचर होते हैं।

1. करना (कार्यवाचक)

2. होना (अस्तित्ववाचक) ।

धातु – क्रिया के मूल प्रकार को धातु कहते है।

परिभाषा – जिन मूल शब्दों से क्रिया बनती है, उसे धातु कहते हैं; जैसे-चल, गा, सो, उठ, खेल, रो, सुन, पढ़,लिख आदि।

लिंग, काल और अवस्था से इनमें परिवर्तन होता रहता है। सामान्य रूप के साथ ‘ना’ लगाकर नए शब्द बनाए जाते हैं। जैसे –
चलना, गाना, सोना, उठना, खेलना, रोना, सुनना, पढ़ना, लिखना आदि।

संज्ञार्थक क्रिया –

‘ना’ युक्त धातु का उसी रूप में प्रयोग भी किया जाता है। ऐसे क्रिया रूप को संज्ञार्थक क्रिया कहते हैं‌।

जैसे –
उसे बोलना आता है।
अभी उसे लिखना नहीं आता।
बच्चा पढ़ना सीख रहा है।

मूल धातु का प्रयोग –

कभी-कभी धातु अपने मूल रूप में भी प्रयोग की जाती है, किंतु प्रायः यह प्रयोग पुरुषवाचक सर्वनाम के मध्यम पुरुष शब्द ‘तू’ के साथ आज्ञा के लिए होता है।
जैसे – तू हट , तू देख , तू चढ़ , तू कह

क्रिया के भेद

कर्म की दृष्टि से क्रिया के दो भेद होते हैं।

  1. अकर्मक क्रिया
  2. सकर्मक क्रिया

1. अकर्मक क्रिया

जिन क्रियाओं के साथ कर्म होता है और क्रिया का फल भी कर्ता पर पड़ता है, उन्हें अकर्मक क्रिया कहते हैं।

उदाहरण देखिए

(क) बच्चा सोता है।

(ख) बंदर कूदता है।

(ग) अमन गा रहा है।

इन वाक्यों में क्रियाओं (सोता है, कूदता है, गा रहा है) के व्यापार का फल उनके कर्ताओं (बच्चा, बंदर, अमन) पर पड़ रहा है। इसलिए ये अकर्मक क्रियाएँ हैं।

2. सकर्मक क्रिया

जिन क्रियाओं के व्यवहार के साथ कर्म जुड़ा रहता है और क्रिया का फल भी कर्म पर पड़ता है, उन्हें सकर्मक क्रिया कहते हैं।

सकर्मक क्रिया का करने वाला कर्ता ही होता है, परंतु उसके कार्य का प्रभाव कर्म पर पड़ता है।

उदाहरण के लिए

तोता मिर्च खा रहा है। -यहाँ ‘खा रहा है’ क्रिया का फल ‘मिर्च’ (कर्म) पर पड़ रहा है।

लड़का साइकिल चलाता – यहाँ ‘चलाता है’ क्रिया का फल ‘साइकिल’ (कर्म) पर पड़ रहा है।

राम ने धनुष उठाया -यहा ‘उठाया’ क्रिया का फल ‘धनुष’ (कर्म) पर पड़ा रहा है।

उपर्युक्त वाक्यों में क्रियाओं का फल उनके कर्म पर पड़ रहा है, अतः ये क्रियाएँ सकर्मक हैं।

यह जानने के लिए कि क्रिया सकर्मक है या अकर्मक क्रिया से पहले क्या लगाकर प्रश्न किया जाता है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर में जो शब्द प्राप्त होता है, वही क्रिया का फल होता है और क्रिया सकर्मक होती है।

जैसे – पंडित जी ने कहा सुनाई। (प्रश्न– पंडित जी ने क्या सुनाई ? उत्तर – कथा

प्रश्न करने पर उत्तर मिला है; अत: क्रिया ‘सुनाई’ सकर्मक क्रिया है और इसका कर्म है ‘कथा’। यदि ऐसा प्रश्न करने पर उत्तर न मिले तो क्रिया अकर्मक होगी।

सकर्मक क्रिया भी दो प्रकार की होती है –

  • (i) एककर्मक क्रिया।
  • (ii) द्विकर्मक क्रिया।

(i) एककर्मक क्रिया – जिस क्रिया में केवल एक ही कर्म होता है, वह एककर्मक क्रिया कहलाती है।

जैसे – (क) अमन आम खाता है। (ख) सीता लड्डू बना रही है।

इन वाक्यों की क्रियाओं के एक-एक कर्म क्रमश: ‘आम’ और ‘लड्डू’ हैं; अत: ये क्रियाएँ एककर्मक हैं।

(ii) द्विकर्मक क्रिया–जिस वाक्य में क्रिया के दो कर्म हों, वह द्विकर्मक क्रिया कहलाती है।

जैसे – (क) अनिल ने रवि को पैन दिया। – ‘दिया’ क्रिया के दो कर्म–रवि, पैन।

( ख ) राधा ने सुमन को चाय पिलाई। – ‘पिलाई’ क्रिया के दो कर्म–सुमन, चाय।

विशेष –

द्विकर्मक क्रियाओं के साथ मुख्य कर्म तथा गौण कर्म का प्रयोग होता है। प्राणिवाचक कर्म गौण तथा अप्राणिवाचक कर्म मुख्य होता है। प्राणिवाचक कर्म के साथ ‘को’ कारक-चिह्न का प्रयोग होता है और गौण कर्म के साथ ‘को’ नहीं लगाया जाता है।

अपूर्ण क्रिया –

सकर्मक क्रियाओं के साथ कर्ता तथा कर्म और अकर्मक क्रिया के साथ कर्ता अपेक्षित होता है, किंतु कभी-कभी क्रिया अपूर्ण रह जाती है।

जैसे – (क) वह है। (ग) ग्राहक खरीद रहा है। (ख) आजाद भारत के थे।

इन वाक्यों के अर्थ अपूर्ण हैं। इनकी क्रियाएँ वाक्य में प्रयुक्त होने पर भी अपना अर्थ प्रकट नहीं कर पा रहीं। ये अपूर्ण क्रियाएँ कहलाती हैं।

पूरक –

अपूर्ण क्रिया के अर्थ को पूर्ण करने के लिए जो शब्द प्रयोग किए जाते है, उन्हें ‘पूरक’ कहते हैं।

उपर्युक्त वाक्यों के पूर्ण अर्थ निम्न प्रकार हैं

(क) वह लाल किला है।

(ख) आजाद भारत के क्रांतिवीर थे।

(ग) ग्राहक कपड़ा खरीद रहा है।

सहायक क्रिया 

वाक्य में मुख्य क्रिया के अतिरिक्त कुछ अन्य क्रियाएँ भी प्रयोग की जाती हैं।
जैसे –

(क) शेर दहाड़ता है। – मुख्य क्रिया-दहाड़ना – सहायक क्रिया है।

(ख) लड़की हँस रही थी। – मुख्य क्रिया-हँसना – सहायक क्रिया थी।

वाक्य में प्रयुक्त ‘है, हैं, हूँ, हो, था, थी, थे’ प्राय: सहायक क्रियाएँ होती हैं, परन्तु जब इनके साथ मुख्य क्रिया न प्रयुक्त हुई हो तो ये ही मुख्य क्रिया का कार्य करती हैं।

जैसे –

सहायक क्रिया के रूप में

  1. वह सुनता है।
  2. रेखा बोल रही है।
  3. तुम कहाँ पढ़े थे?

मुख्य क्रिया के रूप में

  1. तुम घर में हो।
  2. हरिबाबू दफ्तर में है।
  3. तुम प्यासे हो।

संरचना की दृष्टि से क्रिया के भेद । Kriya ke bhed In Hindi​

संरचना की दृष्टि से क्रिया के निम्नलिखित छह भेद होते हैं –

1. संयुक्त क्रिया

जब या दो से अधिक क्रियाएँ एक साथ प्रयुक्त होती है तो वे संयुक्त क्रिया कहलाती हैं ।
जैसे –

(क) उसने पढ़ लिया। (पढ़ + लिया)

(ख) वह खाना खाने लगा। (खाने + लगा)

(ग) मुर्गा एक घंटे तक बोलता रहा। (बोलता + रहा)

(घ) हम दिल्ली से लौट आए। (लौट + आए)

2. प्रेरणार्थक क्रिया

जिन क्रियाओं को कर्ता स्वयं न करके किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, वह प्रेरणार्थक क्रिया कहलाती है; जैसे –

(क) सोहन ने मोहन से पत्र पढ़वाया।

(ख) हरि ने प्रेम से आटा मँगवाया।

यहाँ ‘पढ़वाया’ तथा ‘मँगवाया’ प्रेरणार्थक क्रियाओं के उदाहरण हैं।

3. पूर्वकालिक क्रिया

किसी वाक्य में मुख्य क्रिया से पहले होने वाली क्रिया, पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है।

जैसे –
(क) राम खाना खाकर टहल रहा है। (खाकर)
(ख) कपिल लेटकर हँस रहा है। (लेटकर)

4. नामधातु क्रिया

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि शब्दों से बनने वाली क्रियाएँ, नामधातु क्रिया कहलाती हैं।
जैसे –

संज्ञा शब्दों से – रंग (रँगना), लाज (लजाना), शर्म (शर्माना), थरथर (थरथराना) आदि।

सर्वनाम शब्दों से – अपना (अपनाना) आदि।

विशेषणों से –
भोगी (भोगना), दोहरा (दोहराना), साठ (सठियाना), मेहनत (मेहनताना) आदि।

5. विधिसूचक क्रिया

क्रिया के जिस रूप से विधि (आज्ञा, उपदेश, प्रार्थना, सलाह, अनुरोध आदि) प्रकट हो, वह विधिसूचक क्रिया कहलाती है।
जैसे –

(क) पानी लेकर आओ। (आज्ञा)

(ख) कृपया देर न करें। (अनुरोध)

(ग) हे प्रभु ! सब पर कृपादृष्टि कर। (प्रार्थना)

6. कृदन्त क्रिया

जो क्रियाएँ क्रिया शब्दों के अन्त में प्रत्यय (Suffix) लगाकर बनती हैं, उन्हें कृदन्त क्रियाएँ कहते हैं; जैसे–चल, लिख, पढ़ आदि मूल धातु हैं। इनके साथ ता, ना, कर आदि प्रत्यय लगाकर क्रिया बनाई जाती है।

जैसे –
चल + ना = चलना

लिख + ना = लिखना

पढ़ + ना = पढ़ना

क्रिया के रूपांतरण –

क्रिया के रूपों में लिंग, वचन, पुरुष, काल व वाच्य के अनुसार परिवर्तन होते हैं।

1. लिंग के कारण क्रिया का परिवर्तित रूप –

विपिन खेलता है।

पूनम खेलती है।

शिवम् कूदा।

मानसी कूदी।

अर्थात कर्ता पुल्लिंग है तो क्रिया पुल्लिंग और कर्ता स्त्रीलिंग है तो क्रिया स्त्रीलिंग रूप में लगाई जाती है।

2. वचन के कारण क्रिया का परिवर्तित रूप –

नौकर चला गया।

नौकर चले गए।

कुत्ता तेज भौंका।

कुत्ते तेज भौंके।

3. पुरूष-भेद के कारण क्रिया का परिवर्तित रूप –

पुरुष का संबंध सर्वनाम से है। पुरुष भेद के कारण भी क्रिया रूपों में परिवर्तन होता है‌।

जैसे –

उत्तम पुरुष मध्यम पुरुष अन्य पुरुष
मैं लिखता हूँ। तू लिखता है। वह लिखता है।
हम लिखते हैं। तुम लिखते हो। वे लिखते हैं।

4. काल के अनुसार क्रिया का परिवर्तित रूप –

वर्तमानकाल भूतकाल भविष्यत्काल
दिनेश ऑफिस जाता है। दिनेश ऑफिस गया था। दिनेश ऑफिस जाएगा।

क्रिया के प्रयोग

वाक्यों में क्रिया के पुरुष, लिंग और वचन कभी कर्ता के अनुसार होते हैं, कभी कर्म अनुसार तथा कभी इन के दोनों में से किसी के भी अनुसार नहीं होते। इस आधार पर क्रिया का तीन प्रकार से प्रयोग होता है

  1. कर्तरि प्रयोग (कर्ता के अनुसार) – जब क्रिया कर्ता के लिंग/वचन के अनुसार प्रयोग होती है; जैसे विष्णु कम्प्यूटर सीखता है।
  2. कर्मणि प्रयोग (कर्म के अनुसार) – जब क्रिया कर्म के लिंग/वचन के अनुसार प्रयोग होती है; जैसे विष्णु ने लस्सी पी।
  3. भावे प्रयोग (न कर्ता, न कर्म के अनुसार) – जब क्रिया कर्ता या कर्म दोनों में से किसी के भी लिंग/वचन के अनुसार प्रयोग नहीं होती है; जैसे मोनिका से बोला नहीं जाता।

FAQs

क्रिया किसे कहते हैं?

एक क्रिया एक शब्द है जो एक शारीरिक क्रिया (जैसे, "ड्राइव"), एक मानसिक क्रिया (जैसे, "सोच"), या होने की स्थिति (जैसे, "अस्तित्व") को इंगित करता है। प्रत्येक वाक्य में एक क्रिया होती है।

क्रिया के कितने भेद होते हैं?

क्रिया के मुख्य दो भेद होते हैं—(1) सकर्मक क्रिया और (2) अकर्मक क्रिया।

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क्रिया क्या है? क्रिया के भेद, संरचना, क्रिया के प्रयोग

क्रिया वे शब्द होते हैं जो किसी कार्य के होने या करने अथवा किसी व्यक्ति या वस्तु की स्थिति का बोध कराते हैं।

एक क्रिया एक शब्द है जो एक शारीरिक क्रिया (जैसे, “ड्राइव”), एक मानसिक क्रिया (जैसे, “सोच”), या होने की स्थिति (जैसे, “अस्तित्व”) को इंगित करता है। प्रत्येक वाक्य में एक क्रिया होती है। संज्ञा या सर्वनाम क्या कर रहा है, इसका वर्णन करने के लिए क्रियाओं का उपयोग लगभग हमेशा संज्ञा या सर्वनाम के साथ किया जाता है।

क्रिया क्या है?

जिन शब्दों से किसी कार्य के करने या होने का भाव प्रकट होता है, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे – पढ़ना, लिखना, सोना आदि।

प्रत्येक वाक्य में क्रिया का होना आवश्यक होता है। हिन्दी भाषा में क्रिया वाक्य के अन्त में आती है। कुछ वाक्यों में एक से अधिक क्रियाएँ भी होती हैं।

उदाहरण –

  1. वह सितार बजा रहा था। (कार्य होने का बोध)
  2. बारिश में छत गिर गयी। (घटना के होने का बोध)
  3. टोकरी स्टूल पर है। (वस्तु में अस्तित्व का बोध)

ध्यान दीजिए

माँ ने पूछा – “इतनी देर तक कहाँ थी?” बेटी —“प्रिया के घर।”

यहाँ दूसरे वाक्य में क्रिया नहीं है, फिर भी यह वाक्य पूर्ण है। कई बार वाक्य में क्रिया छिपी रहती हैं। यह वाक्य इस प्रकार पूर्ण होगा।

बेटी – “प्रिया के घर थी।”

इस प्रकार, क्रिया की परिभाषा में दो तत्व दृष्टिगोचर होते हैं।

1. करना (कार्यवाचक)

2. होना (अस्तित्ववाचक) ।

धातु – क्रिया के मूल प्रकार को धातु कहते है।

परिभाषा – जिन मूल शब्दों से क्रिया बनती है, उसे धातु कहते हैं; जैसे-चल, गा, सो, उठ, खेल, रो, सुन, पढ़,लिख आदि।

लिंग, काल और अवस्था से इनमें परिवर्तन होता रहता है। सामान्य रूप के साथ ‘ना’ लगाकर नए शब्द बनाए जाते हैं। जैसे –
चलना, गाना, सोना, उठना, खेलना, रोना, सुनना, पढ़ना, लिखना आदि।

संज्ञार्थक क्रिया –

‘ना’ युक्त धातु का उसी रूप में प्रयोग भी किया जाता है। ऐसे क्रिया रूप को संज्ञार्थक क्रिया कहते हैं‌।

जैसे –
उसे बोलना आता है।
अभी उसे लिखना नहीं आता।
बच्चा पढ़ना सीख रहा है।

मूल धातु का प्रयोग –

कभी-कभी धातु अपने मूल रूप में भी प्रयोग की जाती है, किंतु प्रायः यह प्रयोग पुरुषवाचक सर्वनाम के मध्यम पुरुष शब्द ‘तू’ के साथ आज्ञा के लिए होता है।
जैसे – तू हट , तू देख , तू चढ़ , तू कह

क्रिया के भेद

कर्म की दृष्टि से क्रिया के दो भेद होते हैं।

  1. अकर्मक क्रिया
  2. सकर्मक क्रिया

1. अकर्मक क्रिया

जिन क्रियाओं के साथ कर्म होता है और क्रिया का फल भी कर्ता पर पड़ता है, उन्हें अकर्मक क्रिया कहते हैं।

उदाहरण देखिए

(क) बच्चा सोता है।

(ख) बंदर कूदता है।

(ग) अमन गा रहा है।

इन वाक्यों में क्रियाओं (सोता है, कूदता है, गा रहा है) के व्यापार का फल उनके कर्ताओं (बच्चा, बंदर, अमन) पर पड़ रहा है। इसलिए ये अकर्मक क्रियाएँ हैं।

2. सकर्मक क्रिया

जिन क्रियाओं के व्यवहार के साथ कर्म जुड़ा रहता है और क्रिया का फल भी कर्म पर पड़ता है, उन्हें सकर्मक क्रिया कहते हैं।

सकर्मक क्रिया का करने वाला कर्ता ही होता है, परंतु उसके कार्य का प्रभाव कर्म पर पड़ता है।

उदाहरण के लिए

तोता मिर्च खा रहा है। -यहाँ ‘खा रहा है’ क्रिया का फल ‘मिर्च’ (कर्म) पर पड़ रहा है।

लड़का साइकिल चलाता – यहाँ ‘चलाता है’ क्रिया का फल ‘साइकिल’ (कर्म) पर पड़ रहा है।

राम ने धनुष उठाया -यहा ‘उठाया’ क्रिया का फल ‘धनुष’ (कर्म) पर पड़ा रहा है।

उपर्युक्त वाक्यों में क्रियाओं का फल उनके कर्म पर पड़ रहा है, अतः ये क्रियाएँ सकर्मक हैं।

यह जानने के लिए कि क्रिया सकर्मक है या अकर्मक क्रिया से पहले क्या लगाकर प्रश्न किया जाता है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर में जो शब्द प्राप्त होता है, वही क्रिया का फल होता है और क्रिया सकर्मक होती है।

जैसे – पंडित जी ने कहा सुनाई। (प्रश्न– पंडित जी ने क्या सुनाई ? उत्तर – कथा

प्रश्न करने पर उत्तर मिला है; अत: क्रिया ‘सुनाई’ सकर्मक क्रिया है और इसका कर्म है ‘कथा’। यदि ऐसा प्रश्न करने पर उत्तर न मिले तो क्रिया अकर्मक होगी।

सकर्मक क्रिया भी दो प्रकार की होती है –

  • (i) एककर्मक क्रिया।
  • (ii) द्विकर्मक क्रिया।

(i) एककर्मक क्रिया – जिस क्रिया में केवल एक ही कर्म होता है, वह एककर्मक क्रिया कहलाती है।

जैसे – (क) अमन आम खाता है। (ख) सीता लड्डू बना रही है।

इन वाक्यों की क्रियाओं के एक-एक कर्म क्रमश: ‘आम’ और ‘लड्डू’ हैं; अत: ये क्रियाएँ एककर्मक हैं।

(ii) द्विकर्मक क्रिया–जिस वाक्य में क्रिया के दो कर्म हों, वह द्विकर्मक क्रिया कहलाती है।

जैसे – (क) अनिल ने रवि को पैन दिया। – ‘दिया’ क्रिया के दो कर्म–रवि, पैन।

( ख ) राधा ने सुमन को चाय पिलाई। – ‘पिलाई’ क्रिया के दो कर्म–सुमन, चाय।

विशेष –

द्विकर्मक क्रियाओं के साथ मुख्य कर्म तथा गौण कर्म का प्रयोग होता है। प्राणिवाचक कर्म गौण तथा अप्राणिवाचक कर्म मुख्य होता है। प्राणिवाचक कर्म के साथ ‘को’ कारक-चिह्न का प्रयोग होता है और गौण कर्म के साथ ‘को’ नहीं लगाया जाता है।

अपूर्ण क्रिया –

सकर्मक क्रियाओं के साथ कर्ता तथा कर्म और अकर्मक क्रिया के साथ कर्ता अपेक्षित होता है, किंतु कभी-कभी क्रिया अपूर्ण रह जाती है।

जैसे – (क) वह है। (ग) ग्राहक खरीद रहा है। (ख) आजाद भारत के थे।

इन वाक्यों के अर्थ अपूर्ण हैं। इनकी क्रियाएँ वाक्य में प्रयुक्त होने पर भी अपना अर्थ प्रकट नहीं कर पा रहीं। ये अपूर्ण क्रियाएँ कहलाती हैं।

पूरक –

अपूर्ण क्रिया के अर्थ को पूर्ण करने के लिए जो शब्द प्रयोग किए जाते है, उन्हें ‘पूरक’ कहते हैं।

उपर्युक्त वाक्यों के पूर्ण अर्थ निम्न प्रकार हैं

(क) वह लाल किला है।

(ख) आजाद भारत के क्रांतिवीर थे।

(ग) ग्राहक कपड़ा खरीद रहा है।

सहायक क्रिया 

वाक्य में मुख्य क्रिया के अतिरिक्त कुछ अन्य क्रियाएँ भी प्रयोग की जाती हैं।
जैसे –

(क) शेर दहाड़ता है। – मुख्य क्रिया-दहाड़ना – सहायक क्रिया है।

(ख) लड़की हँस रही थी। – मुख्य क्रिया-हँसना – सहायक क्रिया थी।

वाक्य में प्रयुक्त ‘है, हैं, हूँ, हो, था, थी, थे’ प्राय: सहायक क्रियाएँ होती हैं, परन्तु जब इनके साथ मुख्य क्रिया न प्रयुक्त हुई हो तो ये ही मुख्य क्रिया का कार्य करती हैं।

जैसे –

सहायक क्रिया के रूप में

  1. वह सुनता है।
  2. रेखा बोल रही है।
  3. तुम कहाँ पढ़े थे?

मुख्य क्रिया के रूप में

  1. तुम घर में हो।
  2. हरिबाबू दफ्तर में है।
  3. तुम प्यासे हो।

संरचना की दृष्टि से क्रिया के भेद । Kriya ke bhed In Hindi​

संरचना की दृष्टि से क्रिया के निम्नलिखित छह भेद होते हैं –

1. संयुक्त क्रिया

जब या दो से अधिक क्रियाएँ एक साथ प्रयुक्त होती है तो वे संयुक्त क्रिया कहलाती हैं ।
जैसे –

(क) उसने पढ़ लिया। (पढ़ + लिया)

(ख) वह खाना खाने लगा। (खाने + लगा)

(ग) मुर्गा एक घंटे तक बोलता रहा। (बोलता + रहा)

(घ) हम दिल्ली से लौट आए। (लौट + आए)

2. प्रेरणार्थक क्रिया

जिन क्रियाओं को कर्ता स्वयं न करके किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, वह प्रेरणार्थक क्रिया कहलाती है; जैसे –

(क) सोहन ने मोहन से पत्र पढ़वाया।

(ख) हरि ने प्रेम से आटा मँगवाया।

यहाँ ‘पढ़वाया’ तथा ‘मँगवाया’ प्रेरणार्थक क्रियाओं के उदाहरण हैं।

3. पूर्वकालिक क्रिया

किसी वाक्य में मुख्य क्रिया से पहले होने वाली क्रिया, पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है।

जैसे –
(क) राम खाना खाकर टहल रहा है। (खाकर)
(ख) कपिल लेटकर हँस रहा है। (लेटकर)

4. नामधातु क्रिया

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि शब्दों से बनने वाली क्रियाएँ, नामधातु क्रिया कहलाती हैं।
जैसे –

संज्ञा शब्दों से – रंग (रँगना), लाज (लजाना), शर्म (शर्माना), थरथर (थरथराना) आदि।

सर्वनाम शब्दों से – अपना (अपनाना) आदि।

विशेषणों से –
भोगी (भोगना), दोहरा (दोहराना), साठ (सठियाना), मेहनत (मेहनताना) आदि।

5. विधिसूचक क्रिया

क्रिया के जिस रूप से विधि (आज्ञा, उपदेश, प्रार्थना, सलाह, अनुरोध आदि) प्रकट हो, वह विधिसूचक क्रिया कहलाती है।
जैसे –

(क) पानी लेकर आओ। (आज्ञा)

(ख) कृपया देर न करें। (अनुरोध)

(ग) हे प्रभु ! सब पर कृपादृष्टि कर। (प्रार्थना)

6. कृदन्त क्रिया

जो क्रियाएँ क्रिया शब्दों के अन्त में प्रत्यय (Suffix) लगाकर बनती हैं, उन्हें कृदन्त क्रियाएँ कहते हैं; जैसे–चल, लिख, पढ़ आदि मूल धातु हैं। इनके साथ ता, ना, कर आदि प्रत्यय लगाकर क्रिया बनाई जाती है।

जैसे –
चल + ना = चलना

लिख + ना = लिखना

पढ़ + ना = पढ़ना

क्रिया के रूपांतरण –

क्रिया के रूपों में लिंग, वचन, पुरुष, काल व वाच्य के अनुसार परिवर्तन होते हैं।

1. लिंग के कारण क्रिया का परिवर्तित रूप –

विपिन खेलता है।

पूनम खेलती है।

शिवम् कूदा।

मानसी कूदी।

अर्थात कर्ता पुल्लिंग है तो क्रिया पुल्लिंग और कर्ता स्त्रीलिंग है तो क्रिया स्त्रीलिंग रूप में लगाई जाती है।

2. वचन के कारण क्रिया का परिवर्तित रूप –

नौकर चला गया।

नौकर चले गए।

कुत्ता तेज भौंका।

कुत्ते तेज भौंके।

3. पुरूष-भेद के कारण क्रिया का परिवर्तित रूप –

पुरुष का संबंध सर्वनाम से है। पुरुष भेद के कारण भी क्रिया रूपों में परिवर्तन होता है‌।

जैसे –

उत्तम पुरुष मध्यम पुरुष अन्य पुरुष
मैं लिखता हूँ। तू लिखता है। वह लिखता है।
हम लिखते हैं। तुम लिखते हो। वे लिखते हैं।

4. काल के अनुसार क्रिया का परिवर्तित रूप –

वर्तमानकाल भूतकाल भविष्यत्काल
दिनेश ऑफिस जाता है। दिनेश ऑफिस गया था। दिनेश ऑफिस जाएगा।

क्रिया के प्रयोग

वाक्यों में क्रिया के पुरुष, लिंग और वचन कभी कर्ता के अनुसार होते हैं, कभी कर्म अनुसार तथा कभी इन के दोनों में से किसी के भी अनुसार नहीं होते। इस आधार पर क्रिया का तीन प्रकार से प्रयोग होता है

  1. कर्तरि प्रयोग (कर्ता के अनुसार) – जब क्रिया कर्ता के लिंग/वचन के अनुसार प्रयोग होती है; जैसे विष्णु कम्प्यूटर सीखता है।
  2. कर्मणि प्रयोग (कर्म के अनुसार) – जब क्रिया कर्म के लिंग/वचन के अनुसार प्रयोग होती है; जैसे विष्णु ने लस्सी पी।
  3. भावे प्रयोग (न कर्ता, न कर्म के अनुसार) – जब क्रिया कर्ता या कर्म दोनों में से किसी के भी लिंग/वचन के अनुसार प्रयोग नहीं होती है; जैसे मोनिका से बोला नहीं जाता।

FAQs

क्रिया किसे कहते हैं?

एक क्रिया एक शब्द है जो एक शारीरिक क्रिया (जैसे, "ड्राइव"), एक मानसिक क्रिया (जैसे, "सोच"), या होने की स्थिति (जैसे, "अस्तित्व") को इंगित करता है। प्रत्येक वाक्य में एक क्रिया होती है।

क्रिया के कितने भेद होते हैं?

क्रिया के मुख्य दो भेद होते हैं—(1) सकर्मक क्रिया और (2) अकर्मक क्रिया।

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