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समाज के आधारभूत तत्त्व कौन कौन से है जानिए ..

व्यक्ति सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना मूल रूप से अपनी विविध प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति की प्रक्रिया में करता है। क्योंकि सामाजिक सम्बन्ध अमूर्त होते हैं, अत: समाज को भी अमर्त माना गया है अर्थात इसका कोई निश्चित रूप नहीं है। अगर समाज को व्यक्तियों के मर्त समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है तो इसे 'समाज' न कहलाकर ‘एक समाज' कहा जाता है।

समाज के आधारभूत तत्त्व

समाज का अर्थ जान लेने के पश्चात् इसके निर्णायक अथवा आधारभूत तत्त्वों का पता होना भी अनिवार्य है। इन आधारभूत तत्त्वों को कई बार समाज की सामाजिक आवश्यकताएँ (Social necessities) भी कहा जाता है। ये निर्णायक तत्त्व प्रत्येक समाज, चाहे वह पशु समाज हो या मानव समाज, में पाए जाते हैं। परन्तु समाज के आधारभूत तत्त्वों के बारे में विद्वानों में थोड़े-बहुत मतभेद पाए जाते हैं।

किंग्सले डेविस ने समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं या निर्णायक तत्त्वों को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभाजित किया है-

1. जनसंख्या का प्रतिपालन

जनसंख्या को बनाए रखने के लिए कुछ आवश्यकताएँ होती हैं। इनकी पूर्ति के द्वारा ही जनसंख्या का निर्वाह होता है। वे आवश्यकताएँ निम्नांकित हैं

  • पोषण का प्रबन्ध- जनसंख्या में सदस्यों को उचित पालन-पोषण की आवश्यकता होती है। भोजन के द्वारा उन्हें जीवन सम्बन्धी सुरक्षा की प्राप्ति होती है।
  • क्षति के विरुद्ध संरक्षण- जनसंख्या को बनाए रखने के लिए सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करना समाज का दूसरा कार्य है। बाढ़, महामारी, अकाल इत्यादि ऐसी दुर्घटनाएँ हैं जिनसे मनुष्य का सम्पूर्ण अस्तित्व नष्ट हो जाता है। समाज इनके विरुद्ध अपने सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • नए जीवों का पुनरुत्पादन- नवीन प्राणियों की उत्पत्ति समाज की जनसंख्या को बनाए रखने में सहायक होती है। यदि उत्पत्ति न हो, तो समाज ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए नवीन प्राणियों की उत्पत्ति समाज का आवश्यक तत्त्व है।

2. जनसंख्या के बीच कार्य का विभाजन

सदस्यों में उचित श्रम-विभाजन समाज के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इससे मनुष्यों में पारस्परिक सहयोग की भावना पनपती है। सहयोग की भावना के होने से संगठन में दृढ़ता भी आती है। श्रम-विभाजन से मनुष्यों को पदों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है और वे पदों के अनुरूप दायित्व का निर्वाह करते हैं।

3. समूह का संगठन

समाज के सदस्यों के मध्य एकता की भावना समाज का अनिवार्य तत्त्व है। सम्पर्कों के आधार पर प्राणियों में अन्तक्रियाएँ होती हैं। इसी के फलस्वरूप उनमें सहयोगात्मक व असहयोगात्मक भावनाएँ विकसित होती हैं। समूह सभी सदस्यों से सहिष्णुता एवं सहयोग की आशा करता है। भेदभाव, असहयोग, असहिष्णुता आदि कटुता को जन्म देते हैं। इसीलिए समाज सदस्यों से इनकी आशा नहीं करता है। अत: इसमें दो बातें प्रमुख हैं-

  • सदस्यों के मध्य सम्पर्क की प्रेरणा, तथा
  • पारस्परिक सहिष्णुता की प्रेरणा तथा बाहरी तत्त्वों का प्रतिरोध।

4. सामाजिक व्यवस्था की निरन्तरता

प्रत्येक समाज के स्थायित्व एवं निरन्तरता के लिए सामाजिक व्यवस्था में निरन्तरता एवं स्थिरता अनिवार्य है। इसी के फलस्वरूप व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती रहती है। इस प्रकार सामाजिक व्यवस्था का स्थिर होना अत्यन्त ही आवश्यक है। टी० बी० बॉटोमोर ने भी समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य व्यवस्थाओं व प्रक्रियाओं का उल्लेख किया है जिन्हें समाज की प्रकार्यात्मक पूर्व-आवश्यकताएँ कहा जा सकता है। जो न्यूनतम आवश्यकताएँ प्रतीत होती हैं, वे निम्नलिखित हैं-

  1. संचार की एक व्यवस्था,
  2. वस्तुओं के उत्पादन तथा वितरण से सम्बन्धित आर्थिक व्यवस्था,
  3. नवीन पीढ़ी का समाजीकरण करने वाली व्यवस्थाएँ (परिवार व शिक्षा सहित),
  4. सत्ता व शक्ति के वितरण की व्यवस्था, तथा
  5. सामाजिक समन्वय को बनाए रखने अथवा बढ़ाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था (जो महत्त्वपूर्ण घटनाओं; जैसे जन्म, वयस्कता, कोर्टशिप, विवाह तथा मृत्यु आदि को सामाजिक मान्यताएँ प्रदान कर सके)।

हेरी एम० जॉनसन के अनुसार समाज के चार अनिवार्य तत्त्व हैं। ये निम्नलिखित हैं-

निश्चित भू-भाग

समाज एक भू-भागीय समूह है। व्यक्तियों द्वारा किन्हीं निश्चित सीमाओं में रहने के परिणामस्वरूप ही समाज का निर्माण होता है।

यौन प्रजनन

समाज में सदस्यों की भर्ती तथा समाज की निरन्तरता, समूह के भीतर ही की जाने वाली यौन प्रजनन प्रक्रिया द्वारा होती है।

सर्वांगव्यापी संस्कृति

बिना संस्कृति के समाज अपूर्ण है। अत: एक सर्वांगव्यापी संस्कृति का होना समाज के लिए अनिवार्य है।

आत्मनिर्भरता

समाज का एक अन्य अनिवार्य तत्त्व यह है कि वह किसी समूह का उपसमूह नहीं होता। इस कसौटी के आधार पर उन समूहों को भी समाज कहा जा सकता है जोकि राजनीतिक दृष्टि से अन्य समूह के अधीन होते हुए भी पूर्णत: उसमें समा नहीं पाए हैं। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न विद्वानों ने समाज के आधारभूत तत्त्वों की विवेचना समाज के अपने अर्थ के अनुरूप की है।

FAQs

समाज कैसे बनता है?

समाज उन लोगों के समूहों द्वारा बनाए जाते हैं जो अपने सामान्य हितों को बढ़ावा देने के लिए शामिल होना चाहते हैं । ये हित मनोरंजन, सांस्कृतिक या धर्मार्थ हो सकते हैं। समाज किसी भी उपयोगी उद्देश्य के लिए गठित किए जा सकते हैं लेकिन उन्हें व्यापार या व्यवसाय करने के लिए नहीं बनाया जा सकता है।

समाज की परिभाषा क्या है?

एक समाज निरंतर सामाजिक संपर्क में भाग लेने वाले लोगों का एक समूह है, या एक ही सामाजिक या स्थानिक क्षेत्र पर कब्जा करने वाला एक व्यापक सामाजिक समूह है, जो आम तौर पर एक ही राजनीतिक शक्ति और सांस्कृतिक मानकों से प्रभावित होता है।

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समाज के आधारभूत तत्त्व कौन कौन से है जानिए ..

व्यक्ति सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना मूल रूप से अपनी विविध प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति की प्रक्रिया में करता है। क्योंकि सामाजिक सम्बन्ध अमूर्त होते हैं, अत: समाज को भी अमर्त माना गया है अर्थात इसका कोई निश्चित रूप नहीं है। अगर समाज को व्यक्तियों के मर्त समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है तो इसे 'समाज' न कहलाकर ‘एक समाज' कहा जाता है।

समाज के आधारभूत तत्त्व

समाज का अर्थ जान लेने के पश्चात् इसके निर्णायक अथवा आधारभूत तत्त्वों का पता होना भी अनिवार्य है। इन आधारभूत तत्त्वों को कई बार समाज की सामाजिक आवश्यकताएँ (Social necessities) भी कहा जाता है। ये निर्णायक तत्त्व प्रत्येक समाज, चाहे वह पशु समाज हो या मानव समाज, में पाए जाते हैं। परन्तु समाज के आधारभूत तत्त्वों के बारे में विद्वानों में थोड़े-बहुत मतभेद पाए जाते हैं।

किंग्सले डेविस ने समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं या निर्णायक तत्त्वों को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभाजित किया है-

1. जनसंख्या का प्रतिपालन

जनसंख्या को बनाए रखने के लिए कुछ आवश्यकताएँ होती हैं। इनकी पूर्ति के द्वारा ही जनसंख्या का निर्वाह होता है। वे आवश्यकताएँ निम्नांकित हैं

  • पोषण का प्रबन्ध- जनसंख्या में सदस्यों को उचित पालन-पोषण की आवश्यकता होती है। भोजन के द्वारा उन्हें जीवन सम्बन्धी सुरक्षा की प्राप्ति होती है।
  • क्षति के विरुद्ध संरक्षण- जनसंख्या को बनाए रखने के लिए सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करना समाज का दूसरा कार्य है। बाढ़, महामारी, अकाल इत्यादि ऐसी दुर्घटनाएँ हैं जिनसे मनुष्य का सम्पूर्ण अस्तित्व नष्ट हो जाता है। समाज इनके विरुद्ध अपने सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • नए जीवों का पुनरुत्पादन- नवीन प्राणियों की उत्पत्ति समाज की जनसंख्या को बनाए रखने में सहायक होती है। यदि उत्पत्ति न हो, तो समाज ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए नवीन प्राणियों की उत्पत्ति समाज का आवश्यक तत्त्व है।

2. जनसंख्या के बीच कार्य का विभाजन

सदस्यों में उचित श्रम-विभाजन समाज के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इससे मनुष्यों में पारस्परिक सहयोग की भावना पनपती है। सहयोग की भावना के होने से संगठन में दृढ़ता भी आती है। श्रम-विभाजन से मनुष्यों को पदों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है और वे पदों के अनुरूप दायित्व का निर्वाह करते हैं।

3. समूह का संगठन

समाज के सदस्यों के मध्य एकता की भावना समाज का अनिवार्य तत्त्व है। सम्पर्कों के आधार पर प्राणियों में अन्तक्रियाएँ होती हैं। इसी के फलस्वरूप उनमें सहयोगात्मक व असहयोगात्मक भावनाएँ विकसित होती हैं। समूह सभी सदस्यों से सहिष्णुता एवं सहयोग की आशा करता है। भेदभाव, असहयोग, असहिष्णुता आदि कटुता को जन्म देते हैं। इसीलिए समाज सदस्यों से इनकी आशा नहीं करता है। अत: इसमें दो बातें प्रमुख हैं-

  • सदस्यों के मध्य सम्पर्क की प्रेरणा, तथा
  • पारस्परिक सहिष्णुता की प्रेरणा तथा बाहरी तत्त्वों का प्रतिरोध।

4. सामाजिक व्यवस्था की निरन्तरता

प्रत्येक समाज के स्थायित्व एवं निरन्तरता के लिए सामाजिक व्यवस्था में निरन्तरता एवं स्थिरता अनिवार्य है। इसी के फलस्वरूप व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती रहती है। इस प्रकार सामाजिक व्यवस्था का स्थिर होना अत्यन्त ही आवश्यक है। टी० बी० बॉटोमोर ने भी समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य व्यवस्थाओं व प्रक्रियाओं का उल्लेख किया है जिन्हें समाज की प्रकार्यात्मक पूर्व-आवश्यकताएँ कहा जा सकता है। जो न्यूनतम आवश्यकताएँ प्रतीत होती हैं, वे निम्नलिखित हैं-

  1. संचार की एक व्यवस्था,
  2. वस्तुओं के उत्पादन तथा वितरण से सम्बन्धित आर्थिक व्यवस्था,
  3. नवीन पीढ़ी का समाजीकरण करने वाली व्यवस्थाएँ (परिवार व शिक्षा सहित),
  4. सत्ता व शक्ति के वितरण की व्यवस्था, तथा
  5. सामाजिक समन्वय को बनाए रखने अथवा बढ़ाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था (जो महत्त्वपूर्ण घटनाओं; जैसे जन्म, वयस्कता, कोर्टशिप, विवाह तथा मृत्यु आदि को सामाजिक मान्यताएँ प्रदान कर सके)।

हेरी एम० जॉनसन के अनुसार समाज के चार अनिवार्य तत्त्व हैं। ये निम्नलिखित हैं-

निश्चित भू-भाग

समाज एक भू-भागीय समूह है। व्यक्तियों द्वारा किन्हीं निश्चित सीमाओं में रहने के परिणामस्वरूप ही समाज का निर्माण होता है।

यौन प्रजनन

समाज में सदस्यों की भर्ती तथा समाज की निरन्तरता, समूह के भीतर ही की जाने वाली यौन प्रजनन प्रक्रिया द्वारा होती है।

सर्वांगव्यापी संस्कृति

बिना संस्कृति के समाज अपूर्ण है। अत: एक सर्वांगव्यापी संस्कृति का होना समाज के लिए अनिवार्य है।

आत्मनिर्भरता

समाज का एक अन्य अनिवार्य तत्त्व यह है कि वह किसी समूह का उपसमूह नहीं होता। इस कसौटी के आधार पर उन समूहों को भी समाज कहा जा सकता है जोकि राजनीतिक दृष्टि से अन्य समूह के अधीन होते हुए भी पूर्णत: उसमें समा नहीं पाए हैं। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न विद्वानों ने समाज के आधारभूत तत्त्वों की विवेचना समाज के अपने अर्थ के अनुरूप की है।

FAQs

समाज कैसे बनता है?

समाज उन लोगों के समूहों द्वारा बनाए जाते हैं जो अपने सामान्य हितों को बढ़ावा देने के लिए शामिल होना चाहते हैं । ये हित मनोरंजन, सांस्कृतिक या धर्मार्थ हो सकते हैं। समाज किसी भी उपयोगी उद्देश्य के लिए गठित किए जा सकते हैं लेकिन उन्हें व्यापार या व्यवसाय करने के लिए नहीं बनाया जा सकता है।

समाज की परिभाषा क्या है?

एक समाज निरंतर सामाजिक संपर्क में भाग लेने वाले लोगों का एक समूह है, या एक ही सामाजिक या स्थानिक क्षेत्र पर कब्जा करने वाला एक व्यापक सामाजिक समूह है, जो आम तौर पर एक ही राजनीतिक शक्ति और सांस्कृतिक मानकों से प्रभावित होता है।

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