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छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियां

छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियां

छत्तीसगढ़ राज्य एक जनजाति बाहुल्य राज्य है, छत्तीसगढ़ में कुल 42 जनजातियां व 161 उपजातिया पाई जाती है छत्तीसगढ़ मॆं कई जातियां और जनजातियां निवास करती हैं। वहां की जातियाँ इस प्रकार से हैं। छत्तीसगढ राज्य में धनवार जनजाति बहुतायत में निवासरत है। इस जाति को लोड़ा एवं बैगा भी कहा जाता है

ये लोग प्राय:जंगल,पहाड़ में रहते है और कंदमूल जंगली जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरते है। ये लोगों को तो सरकार ने आदिवासी घोसित किया है परंतु आज भी इस जातियो को  पूर्ण रूप से लाभ नहीं मील पा रहा है.

छत्तीसगढ़ की कुछ प्रमुख जनजातियां 

दोस्तों आज आप लोगो को कुछ महत्वपूर्ण छत्तिसगढ की जनजातियो के बारे में जानने को मिलेगा .जो छत्तीसगढ़ की किसी भी परीक्षा की दृष्टी से महत्व पूर्ण है।

गोंड जनजाति
  • जनसंख्या की दृष्टि से ये राज्य की सबसे बड़ी जनजाति है। ये बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर, सुकमा,जांजगीर-चंपा और दुर्ग जिले में पाये जाते है।गोंड तथा उसकी उपजातिया स्वयं की पहचान ‘कोया’ या ‘कोयतोर शब्दों से करती है जिसका अर्थ ‘ मनुष्य’ या ‘पर्वतवासी मनुष्य’ है।
  • गोंड जनजाति में मदिरापान का काफी ज्यादा प्रचलन है। इनके मुख्य देवता ‘दूल्हा देव’ है।इनमे विधवा तथा बहु विवाह का प्रचलन भी पाया जाता है। गोंड में दूध लौटावा विवाह भी देखने की मिलता है। ये लोग बहूत ईमानदार होते है।
  • इस प्रजाति की खेती में ‘नरोत’, ‘भरोत’, ‘राय मेना’, ‘कंठ में’ और ‘रेमेना’ आदि प्रमुख हैं।
  • ‘बै’ का अर्थ है- “ओझा या शमन” इस तकनीक के साथ-साथ असेंशन भी लॉग इन किया जाता है। ‘ और ‘लमसेना’ प्रवृत्त है। बैला के गुण पर आधारित है। इस प्रकार दक्ष के गुण पर आधारित है।
  • दक्षिण क्षेत्र की प्रमुख जनजाति गोंड है। जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ा आदिवासी समूह है। ये छत्तीसगढ़ के पूरे अंचल में फैले हुए हैं। पहले महाकौशल में सम्मिलित भूभाग का अधिकांश हिस्सा गोंडवाना कहलाता था।
  • आजादी के पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य के अंतर्गत आने वाली 14 रियासतों में 4 रियासत क्रमशः कवर्धा, रायगढ़, सारनगढ एवं शक्ति गोंड रियासत थी। गोंडों ने श्रेष्ठ सौन्दर्यपरक संस्कृति विकसित की है।
  • नृत्य व गायन उनका प्रमुख मनोरंजन है। बस्तर क्षेत्र की गोंड जनजातियां अपने सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण समझी जाती हैं। ये लोग व्यवस्थित रूप से गाँवों में रहते हैं। मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है। इनकी कृषि प्रथा डिप्पा कहलाती है।
  • इनमें ईमानदारी बहुत होती है।
कोरबा जनजाति
  • कोरबा जनजाति : ये कोरबा,बिलासपुर,सरगुजा,सूरजपुर,एवं रायगढ़ जिले के पूर्वी भाग में निवास करते है। इनके उपजाति में ‘ दिहारिया’ एवं ‘पहाड़ी कोरबा प्रमुख है। दिहारिया कोरबा कृषि कार्य करते है। इस कारण ‘किसान कोरबा भी कहा जाता है।
  •  पहाड़ी कोरबा को ‘बेनबरिया’ भी कहा जाता है। कोरबा जनजाति की अपनी पंचायत होती है। जिसे ‘मैयारी’ कहते है। कोरबा जनजाति का मुख्य त्योहार ‘करमा’ होता है।
  • ये नारायणपुर, बस्तर, कोंडा और बिलासपुर में वृद्धि है। ययां, भुईहार और पांडो इस प्रजाति की फसल भूमि है। ‘भीमसेन’ इन लोगो का मुख्य देवता है।
हल्बा जनजाति
  • हल्वा जनजाति : ये बस्तर, रायपुर, कोंडागांव, कंकेर, सुकमा, दांतेवारा और दुर्ग में रहने की जगह है।
  • इनकी उपजातियों में बस्तरिया,भतेथिया,छत्तीसगढ़िया आदि मुख्य है।
  • हलवाहक होने के कारण इस जनजाति का नाम हल्वा पड़ा है।
  • यह जनजाति रायपुर, दुर्ग, धमतरी  तथा बस्तर जिलों में बसी हुई है।
  • बस्तरहा, छत्तीसगढ़ीयां तथा मरेथियां, हल्बाओं की शाखाएँ हैं। मरेथियाँ अर्थात् हल्बाओं की बोली पर मराठी प्रभाव दिखता है।
  • अधिकांश हल्बा लोग शिक्षित होकर शासन में ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँच गये हैं, अन्य समाजों के सम्पर्क में आकर इनके रीति-रिवाजों में भी पर्याप्त परिवर्तन हुआ है.
  • हल्बा कुशल कृषक होते हैं।
कोरकू जनजाति
  • कोरकू जनजाति : ये रायगढ़,सरगुजा,बलरामपुर और जशपुर जिले में रहते हैं। मोधीर, बवारी, रूमा, नहाला, बोडोया प्रजनन क्षमता है।
  • मोवासी, बवारी, रूमा, नहाला, बोडोया आदि इनकी उपजातियां है।
  • इस जनजाति में विवाह संबंध में वधु-धन चुकाना पड़ता है। इनमे तलाक़ प्रथा एवं विधवा विवाह का भी प्रचलन है।
बिंझवार जनजाति
  • बिंझवार जनजाति : ये बिलावासपुर, रायपुर,बलौदा बाजार में रहने वाले हैं।
  • ये “विध्याचल वासिनी” की पूजा करते हैं।
  • ये अपने को विंध्यवासिनी पुत्री “बारह भाई बेटीकर” को अपना पूर्व मानते हैं।
  • वीर नारायण सिंह बिंझवार जनजाति वर्ग के थे।
कमार जनजाति
  • कमार जनजाति रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़,दुर्ग,गरिया बंद, राजनांद गांव,जांजगीर-चाम्पा, जशपुर,कोरिया,सरगुजा के वन क्षैत्रों में रहने वाले हैं।
  •  इनका मुख्य देवता ” दूल्हा देव” है।
  • ये अधिकतर कृषि मजदुर के रूप में खेतो में काम करते है।
  • ये लकड़ी और बांस की चीजें बनाने में निपुण होते है
कंवर जनजाति
  • कंवर जनजाति : ये बिलासपुर,पुर, रायगढ़, जिंगीर-चांम्पा और सरगुजावर में स्थिति है।
  •  ये पैदा करने वाली महाभारत के कैरव से. इनमे संगोत्री लग्न और विवाह विवाह है।
  • “सगराखंड” प्रमुख देवता है।
खारवार जनजाति
  • खैरवार जनजाति :ये सरगुजा,सूरजपुर,बलरामपुर तथा बिलासपुर जिले में पाये जाते है।इन्हे ‘कथवार’ भी कहा जाता है।
  • कत्था का व्यवसाय करने के कारण इस जनजाति का यह नाम पड़ा है।
भैना जनजाति
  • भैना जनजाति :सतपुड़ा पर्वतमाला एवं छोटानागपुर पठार के बीच सधन वन क्षेत्र के मध्य बिलासपुर, जांजगीर चाम्पा, रायगढ़,रायपुर,बस्तर जिलो में पाये जाते है।
  •  इस जनजाति की उत्पत्ति मिश्र संबंधो के कारण हुआ प्रतीत होता है। किंवदन्ती के अनुसार ये ” बैगा और कंवर ” की वर्ण संकर संताने है।
  • यह पैदा होने की संभावना है। किंवदंती के ये “स्वतंत्रता और कंवर” की वर्णसंकर संताने है।
ओरांव जनजाति
  • ओरांव जनजाति: ये रई, जशपुर, सरगुजा और बिलाैस नगर में वृद्धि है। मछली के प्रकार, मछली के बच्चे के रूप में इसे तैयार करते हैं। इनमे जैसी जगहों में रहने वाले लोग।
  •  इनमे विवाह से पूर्व यौन संबंध रखता है। इनमे अलग-अलग,विविधता और बहु-विवाह का भी है।
  • ओरांव के प्रमुख देवता ” धर्मेश ” है, जो सूर्य देवता का ही रूप है।
बैगा जनजाति
  • बैगा जनजाति :इस जनजाति की उपजातियों में ‘नरोतिया’, ‘भरोतिया’, ‘रायमैना’, ‘कंठमैना’ और ‘रेमैना’ आदि प्रमुख हैं। बैगा लोगों में संयुक्त परिवार की प्रथा पायी जाती है। इनमें मुकद्दम गाँव का मुखिया होता है।
  • ‘बैगा’ का अर्थ होता है- “ओझा या शमन”। इस जाति के लोग झाड़-फूँक और अंध विश्वास जैसी परम्पराओं में विश्वास करते हैं।इस जाति का मुख्य व्यवसाय झूम खेती एवं शिकार करना है।
  • इस जाति के लोग शेर को अपना अनुज मानते हैं।इनमें सेवा विवाह की ‘लामझेना’, ‘लामिया’ और ‘लमसेना’ प्रथा प्रचलित है।बैगा जनजाति के लोग पीतल, तांबे और एल्यूमीनियम के आभूषण पहनते हैं।
  • इस जाति में ददरिया प्रेम पर आधारित नृत्य दशहरे पर एवं परधौनी लोक नृत्य विवाह के अवसर पर होता है।
  • बैगा जनजाति घने जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है।
  • इस जनजाति के प्रमुख नृत्यों में बैगानी करमा, दशहरा या बिलमा तथा परधौनी नृत्य है। इसके अलावा विभिन्न अवसरों पर घोड़ा पैठाई, बैगा झरपट तथा रीना और फाग नृत्य भी करते हैं।
  • छत्तीसगढ़ की बैगा जनजाति जितने नृत्य करती है और उनमें जैसी विविधता है वैसी संभवतः किसी और जनजाति में कठिनाई से मिलेगी। बैनृत्यगा करधौनी विवाह के अवसर पर बारात की अगवानी के समय किया जाता है, इसी अवसर पर लड़के वालों की ओर से आंगन में हाथी बनकर नचाया जाता है, इसमें विवाह के अवसर को समारोहित करने की कलात्मक चेष्टा है।
  • बैगा फाग होली के अवसर पर किया जाता है, इस नृत्य में मुखौटे का प्रयोग भी होता है।
मारिया जनजाति
  • मारिया जनजाति नारायणपुर, बस्तर,कोंडागांव एवं बिलासपुर जिले में पाये जाते है।
  •  भूमियां, भुईहार एवं पांडो इस जनजाति की प्रमुख उपजाति है।
  • ‘भीमसेन’ इन लोगो का मुख्य देवता है।
मुरिया जनजाति
  • बस्तर की मुरिया जनजाति अपने सौन्दर्यबोध, कलात्मक रुझान और कला परम्परा में विविधता के लिए ख्यात है।
  • इस जनजाति के ककसार, मांदरी, गेंड़ी नृत्य अपनी गीतात्मक, अत्यंत कोमल संरचनाओं और सुन्दर कलात्मक विन्यास के लिए प्रख्यात है।
  • मुरिया जनजाति में माओपाटा के रूप में एक आदिम शिकार नृत्य-नाटिका का प्रचल न भी है, जिसमें उल्लेखनीय रूप से नाट्य के आदिम तत्व मौजूद हैं।
  • गेंड़ी नृत्य किया जाता है गीत नहीं गाये जाते। यह अत्यधिक गतिशील नृत्य है।
  • प्रदर्शनकारी नृत्य रूप के दृष्टिकोण से यह मुरिया जनजाति के जातिगत संगठन में युवाओं की गतिविधि के केन्द्र घोटुल का प्रमुख नृत्य है, इसमें स्त्रियां हिस्सा नहीं लेती।
  • ककसार धार्मिक नृत्य-गीत है। नृत्य के समय युवा पुरुष नर्तक अपनी कमर में पीतल अथवा लोहे की घंटियां बांधे रहते है साथ में छतरी और सिर पर आकर्षक सजावट कर वे नृत्य करते है।
नगेशिया जनजाति
  • यह जनजाति अम्बिकापुर (उत्तर-पुर्व) के डिपाडीह, लखनपुर, अनुपपुर, राजपुर, प्रतापपुर, सीतापुर क्षेत्र, में बसी हुई है.
  • नगेशिया जनजाति का मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है.
  • यह जनजाति जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है।
अन्य जनजाति 

• अहिरवार • कोरवा • उराँव • बिंझीया • भतरा • कँवर • कमार • माड़िय • मुड़िया • भैना • भारिया • बिंझवार • धनवार • नगेशिया • मंझवार • खैरवार • भुंजिया • पारधी • खरिया • गांड़ा या गड़वा • बियार • नमोसुद्र इत्यादि

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FAQ

Q. छत्तीसगढ़ में कितने प्रतिशत जनजातियां रहती है?

Ans: छत्तीसगढ़ राज्य का लगभग एक तिहाई जनसंख्या जनजातियों की है। 16 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जातियों की है जबकि 42 प्रतिशत जनसंख्या अन्य पिछड़ी जातियों की है। इसकी 80 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और आजीविका के साधन के रूप में मुख्यतः कृषि पर निर्भर करती है।

Q. छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति की संख्या कितनी है?

Ans: राज्य की कुल जनसंख्या 2,08,33,803 है। राज्य में कुल 44 अनुसूचित जातियाँ निवास करती है और इस प्रकार राज्य की कुल जनसंख्या का 11.6 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति का है।

Q. छत्तीसगढ़ में आदिवासी की जनसंख्या कितनी है?

Ans: छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति वर्ग के कुल पुरुष जनसंख्या 85118, महिला जनसंख्या 88859 इस प्रकार कुल जनसंख्या 173977 है। इसी प्रकार परियोजना क्षेत्र में कुल 3350 कमार परिवार निवासरत है, जिनकी कुल जनसंख्या 14285 एवं कुल 1606 भुंजिया परिवार निवासरत है.

Q छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा कौन सी जाती है?

Ans: जाति-धर्म के आधार पर छत्तीसगढ़ की जनसंख्या? जाति के आधार पर छत्तीसगढ़ की जनसंख्या पर नजर डाले तो 93.25 प्रतिशत हिन्दू, 2.02 प्रतिशत मुस्लिम, 1.92 प्रतिशत क्रिश्चियन, 0.27 प्रतिशत सिख, 0.28 प्रतिशत बुद्धिस्ट, 0.24 प्रतिशत जैन निवास करते हैं जबकि अन्य जाति के 1.94 प्रतिशत लोग छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं।

Q. छत्तीसगढ़ में आदिवासी विकासखंड कितने हैं?

Ans: इसमें बस्तर, नरायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर,सुकमा ,सूरजपुर , बलरामपुर, कोंडागांव, कांकेर, सरगुजा, कोरिया, कोरबा एवं जशपुर पूर्ण रूप से आदिवासी उपयोजना क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। राज्य में कुल 146 विकासखंड हैं, इनमें आदिवासी विकासखंडों की संख्या 85 है।

Q. छत्तीसगढ़ में कौन कौन सी जाति पाई जाती है?

Ans: छत्तीसगढ़ राज्य एक जनजाति बाहुल्य राज्य है, छत्तीसगढ़ में कुल 42 जनजातियां पाई जाती है, छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजाति गोंड है, इसके अतिरिक्त कँवर, बिंझवार, भैना, भतरा, उरांव, मुंडा, कमार, हल्बा, बैगा, भरिया, नगेशिया, मंझवार, खैरवार और धनवार जनजाति भी काफी संख्या में है।

Q. छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति की संख्या कितनी है?

Ans: छत्तीसगढ़ राज्य की कुल जनसंख्या 2,08,33,803 है। राज्य में कुल 44 अनुसूचित जातियाँ निवास करती है और इस प्रकार राज्य की कुल जनसंख्या का 11.6 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति का है। छत्तीसगढ़ राज्य में सर्वाधिक अनुसूचित जाति वाला जिला रायपुर एवं सबसे कम अनुसूचित जाति वाला जिला दंतेवाड़ा है।

Q.छत्तीसगढ़ में कहाँ और कैसे जनजातियों द्वारा झूम खेती की जाती है?

Ans: इस जनजाति के लोग छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़, लैलूंगा, तमनार विकासखण्ड में, जशपुर जिले के बगीचा, कांसाबेल, दुलदुला, पत्थलगांव विकासखण्डों में, कोरबा जिले के कोरबा, पोड़ी उपरोड़ा, पाली विकासखण्ड तथा बिलासपुर जिले के कोटा व मस्तूरी विकासखण्ड में निवासरत हैं।

Q. छत्तीसगढ़ में झूम खेती कैसे की जाती है?

Ans: स्थानांतरित कृषि या झूम कृषि के तहत पहले वृक्षों तथा वनस्पतियों को काटकर उन्हें जला दिया जाता है| इसके बाद साफ की गई भूमि की पुराने उपकरणों (लकड़ी के हलों आदि) से जुताई करके बीज बो दिये जाते हैं। कुछ वर्षों (प्रायः दो या तीन वर्ष) तक जब तक मृदा में उर्वरता बनी रहती है, इस भूमि पर खेती की जाती है।

Q. जनजातीय समाज में जीवनसाथी प्राप्त करने की कितनी पद्धतियां हैं?

Ans: लोग सामाजिक परंपरा और संस्कृति के अनुरूप आयोजन कराते है। संताल समाज में विवाह को 'बापला' कहा जाता है। इस जनजाति में जीवन साथी के चुनने के बारह तरीके हैं।

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छत्तीसगढ़ राज्य एक जनजाति बाहुल्य राज्य है, छत्तीसगढ़ में कुल 42 जनजातियां व 161 उपजातिया पाई जाती है छत्तीसगढ़ मॆं कई जातियां और जनजातियां निवास करती हैं। वहां की जातियाँ इस प्रकार से हैं। छत्तीसगढ राज्य में धनवार जनजाति बहुतायत में निवासरत है। इस जाति को लोड़ा एवं बैगा भी कहा जाता है

ये लोग प्राय:जंगल,पहाड़ में रहते है और कंदमूल जंगली जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरते है। ये लोगों को तो सरकार ने आदिवासी घोसित किया है परंतु आज भी इस जातियो को  पूर्ण रूप से लाभ नहीं मील पा रहा है.

छत्तीसगढ़ की कुछ प्रमुख जनजातियां 

दोस्तों आज आप लोगो को कुछ महत्वपूर्ण छत्तिसगढ की जनजातियो के बारे में जानने को मिलेगा .जो छत्तीसगढ़ की किसी भी परीक्षा की दृष्टी से महत्व पूर्ण है।

गोंड जनजाति
  • जनसंख्या की दृष्टि से ये राज्य की सबसे बड़ी जनजाति है। ये बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर, सुकमा,जांजगीर-चंपा और दुर्ग जिले में पाये जाते है।गोंड तथा उसकी उपजातिया स्वयं की पहचान ‘कोया’ या ‘कोयतोर शब्दों से करती है जिसका अर्थ ‘ मनुष्य’ या ‘पर्वतवासी मनुष्य’ है।
  • गोंड जनजाति में मदिरापान का काफी ज्यादा प्रचलन है। इनके मुख्य देवता ‘दूल्हा देव’ है।इनमे विधवा तथा बहु विवाह का प्रचलन भी पाया जाता है। गोंड में दूध लौटावा विवाह भी देखने की मिलता है। ये लोग बहूत ईमानदार होते है।
  • इस प्रजाति की खेती में ‘नरोत’, ‘भरोत’, ‘राय मेना’, ‘कंठ में’ और ‘रेमेना’ आदि प्रमुख हैं।
  • ‘बै’ का अर्थ है- “ओझा या शमन” इस तकनीक के साथ-साथ असेंशन भी लॉग इन किया जाता है। ‘ और ‘लमसेना’ प्रवृत्त है। बैला के गुण पर आधारित है। इस प्रकार दक्ष के गुण पर आधारित है।
  • दक्षिण क्षेत्र की प्रमुख जनजाति गोंड है। जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ा आदिवासी समूह है। ये छत्तीसगढ़ के पूरे अंचल में फैले हुए हैं। पहले महाकौशल में सम्मिलित भूभाग का अधिकांश हिस्सा गोंडवाना कहलाता था।
  • आजादी के पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य के अंतर्गत आने वाली 14 रियासतों में 4 रियासत क्रमशः कवर्धा, रायगढ़, सारनगढ एवं शक्ति गोंड रियासत थी। गोंडों ने श्रेष्ठ सौन्दर्यपरक संस्कृति विकसित की है।
  • नृत्य व गायन उनका प्रमुख मनोरंजन है। बस्तर क्षेत्र की गोंड जनजातियां अपने सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण समझी जाती हैं। ये लोग व्यवस्थित रूप से गाँवों में रहते हैं। मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है। इनकी कृषि प्रथा डिप्पा कहलाती है।
  • इनमें ईमानदारी बहुत होती है।
कोरबा जनजाति
  • कोरबा जनजाति : ये कोरबा,बिलासपुर,सरगुजा,सूरजपुर,एवं रायगढ़ जिले के पूर्वी भाग में निवास करते है। इनके उपजाति में ‘ दिहारिया’ एवं ‘पहाड़ी कोरबा प्रमुख है। दिहारिया कोरबा कृषि कार्य करते है। इस कारण ‘किसान कोरबा भी कहा जाता है।
  •  पहाड़ी कोरबा को ‘बेनबरिया’ भी कहा जाता है। कोरबा जनजाति की अपनी पंचायत होती है। जिसे ‘मैयारी’ कहते है। कोरबा जनजाति का मुख्य त्योहार ‘करमा’ होता है।
  • ये नारायणपुर, बस्तर, कोंडा और बिलासपुर में वृद्धि है। ययां, भुईहार और पांडो इस प्रजाति की फसल भूमि है। ‘भीमसेन’ इन लोगो का मुख्य देवता है।
हल्बा जनजाति
  • हल्वा जनजाति : ये बस्तर, रायपुर, कोंडागांव, कंकेर, सुकमा, दांतेवारा और दुर्ग में रहने की जगह है।
  • इनकी उपजातियों में बस्तरिया,भतेथिया,छत्तीसगढ़िया आदि मुख्य है।
  • हलवाहक होने के कारण इस जनजाति का नाम हल्वा पड़ा है।
  • यह जनजाति रायपुर, दुर्ग, धमतरी  तथा बस्तर जिलों में बसी हुई है।
  • बस्तरहा, छत्तीसगढ़ीयां तथा मरेथियां, हल्बाओं की शाखाएँ हैं। मरेथियाँ अर्थात् हल्बाओं की बोली पर मराठी प्रभाव दिखता है।
  • अधिकांश हल्बा लोग शिक्षित होकर शासन में ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँच गये हैं, अन्य समाजों के सम्पर्क में आकर इनके रीति-रिवाजों में भी पर्याप्त परिवर्तन हुआ है.
  • हल्बा कुशल कृषक होते हैं।
कोरकू जनजाति
  • कोरकू जनजाति : ये रायगढ़,सरगुजा,बलरामपुर और जशपुर जिले में रहते हैं। मोधीर, बवारी, रूमा, नहाला, बोडोया प्रजनन क्षमता है।
  • मोवासी, बवारी, रूमा, नहाला, बोडोया आदि इनकी उपजातियां है।
  • इस जनजाति में विवाह संबंध में वधु-धन चुकाना पड़ता है। इनमे तलाक़ प्रथा एवं विधवा विवाह का भी प्रचलन है।
बिंझवार जनजाति
  • बिंझवार जनजाति : ये बिलावासपुर, रायपुर,बलौदा बाजार में रहने वाले हैं।
  • ये “विध्याचल वासिनी” की पूजा करते हैं।
  • ये अपने को विंध्यवासिनी पुत्री “बारह भाई बेटीकर” को अपना पूर्व मानते हैं।
  • वीर नारायण सिंह बिंझवार जनजाति वर्ग के थे।
कमार जनजाति
  • कमार जनजाति रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़,दुर्ग,गरिया बंद, राजनांद गांव,जांजगीर-चाम्पा, जशपुर,कोरिया,सरगुजा के वन क्षैत्रों में रहने वाले हैं।
  •  इनका मुख्य देवता ” दूल्हा देव” है।
  • ये अधिकतर कृषि मजदुर के रूप में खेतो में काम करते है।
  • ये लकड़ी और बांस की चीजें बनाने में निपुण होते है
कंवर जनजाति
  • कंवर जनजाति : ये बिलासपुर,पुर, रायगढ़, जिंगीर-चांम्पा और सरगुजावर में स्थिति है।
  •  ये पैदा करने वाली महाभारत के कैरव से. इनमे संगोत्री लग्न और विवाह विवाह है।
  • “सगराखंड” प्रमुख देवता है।
खारवार जनजाति
  • खैरवार जनजाति :ये सरगुजा,सूरजपुर,बलरामपुर तथा बिलासपुर जिले में पाये जाते है।इन्हे ‘कथवार’ भी कहा जाता है।
  • कत्था का व्यवसाय करने के कारण इस जनजाति का यह नाम पड़ा है।
भैना जनजाति
  • भैना जनजाति :सतपुड़ा पर्वतमाला एवं छोटानागपुर पठार के बीच सधन वन क्षेत्र के मध्य बिलासपुर, जांजगीर चाम्पा, रायगढ़,रायपुर,बस्तर जिलो में पाये जाते है।
  •  इस जनजाति की उत्पत्ति मिश्र संबंधो के कारण हुआ प्रतीत होता है। किंवदन्ती के अनुसार ये ” बैगा और कंवर ” की वर्ण संकर संताने है।
  • यह पैदा होने की संभावना है। किंवदंती के ये “स्वतंत्रता और कंवर” की वर्णसंकर संताने है।
ओरांव जनजाति
  • ओरांव जनजाति: ये रई, जशपुर, सरगुजा और बिलाैस नगर में वृद्धि है। मछली के प्रकार, मछली के बच्चे के रूप में इसे तैयार करते हैं। इनमे जैसी जगहों में रहने वाले लोग।
  •  इनमे विवाह से पूर्व यौन संबंध रखता है। इनमे अलग-अलग,विविधता और बहु-विवाह का भी है।
  • ओरांव के प्रमुख देवता ” धर्मेश ” है, जो सूर्य देवता का ही रूप है।
बैगा जनजाति
  • बैगा जनजाति :इस जनजाति की उपजातियों में ‘नरोतिया’, ‘भरोतिया’, ‘रायमैना’, ‘कंठमैना’ और ‘रेमैना’ आदि प्रमुख हैं। बैगा लोगों में संयुक्त परिवार की प्रथा पायी जाती है। इनमें मुकद्दम गाँव का मुखिया होता है।
  • ‘बैगा’ का अर्थ होता है- “ओझा या शमन”। इस जाति के लोग झाड़-फूँक और अंध विश्वास जैसी परम्पराओं में विश्वास करते हैं।इस जाति का मुख्य व्यवसाय झूम खेती एवं शिकार करना है।
  • इस जाति के लोग शेर को अपना अनुज मानते हैं।इनमें सेवा विवाह की ‘लामझेना’, ‘लामिया’ और ‘लमसेना’ प्रथा प्रचलित है।बैगा जनजाति के लोग पीतल, तांबे और एल्यूमीनियम के आभूषण पहनते हैं।
  • इस जाति में ददरिया प्रेम पर आधारित नृत्य दशहरे पर एवं परधौनी लोक नृत्य विवाह के अवसर पर होता है।
  • बैगा जनजाति घने जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है।
  • इस जनजाति के प्रमुख नृत्यों में बैगानी करमा, दशहरा या बिलमा तथा परधौनी नृत्य है। इसके अलावा विभिन्न अवसरों पर घोड़ा पैठाई, बैगा झरपट तथा रीना और फाग नृत्य भी करते हैं।
  • छत्तीसगढ़ की बैगा जनजाति जितने नृत्य करती है और उनमें जैसी विविधता है वैसी संभवतः किसी और जनजाति में कठिनाई से मिलेगी। बैनृत्यगा करधौनी विवाह के अवसर पर बारात की अगवानी के समय किया जाता है, इसी अवसर पर लड़के वालों की ओर से आंगन में हाथी बनकर नचाया जाता है, इसमें विवाह के अवसर को समारोहित करने की कलात्मक चेष्टा है।
  • बैगा फाग होली के अवसर पर किया जाता है, इस नृत्य में मुखौटे का प्रयोग भी होता है।
मारिया जनजाति
  • मारिया जनजाति नारायणपुर, बस्तर,कोंडागांव एवं बिलासपुर जिले में पाये जाते है।
  •  भूमियां, भुईहार एवं पांडो इस जनजाति की प्रमुख उपजाति है।
  • ‘भीमसेन’ इन लोगो का मुख्य देवता है।
मुरिया जनजाति
  • बस्तर की मुरिया जनजाति अपने सौन्दर्यबोध, कलात्मक रुझान और कला परम्परा में विविधता के लिए ख्यात है।
  • इस जनजाति के ककसार, मांदरी, गेंड़ी नृत्य अपनी गीतात्मक, अत्यंत कोमल संरचनाओं और सुन्दर कलात्मक विन्यास के लिए प्रख्यात है।
  • मुरिया जनजाति में माओपाटा के रूप में एक आदिम शिकार नृत्य-नाटिका का प्रचल न भी है, जिसमें उल्लेखनीय रूप से नाट्य के आदिम तत्व मौजूद हैं।
  • गेंड़ी नृत्य किया जाता है गीत नहीं गाये जाते। यह अत्यधिक गतिशील नृत्य है।
  • प्रदर्शनकारी नृत्य रूप के दृष्टिकोण से यह मुरिया जनजाति के जातिगत संगठन में युवाओं की गतिविधि के केन्द्र घोटुल का प्रमुख नृत्य है, इसमें स्त्रियां हिस्सा नहीं लेती।
  • ककसार धार्मिक नृत्य-गीत है। नृत्य के समय युवा पुरुष नर्तक अपनी कमर में पीतल अथवा लोहे की घंटियां बांधे रहते है साथ में छतरी और सिर पर आकर्षक सजावट कर वे नृत्य करते है।
नगेशिया जनजाति
  • यह जनजाति अम्बिकापुर (उत्तर-पुर्व) के डिपाडीह, लखनपुर, अनुपपुर, राजपुर, प्रतापपुर, सीतापुर क्षेत्र, में बसी हुई है.
  • नगेशिया जनजाति का मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है.
  • यह जनजाति जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है।
अन्य जनजाति 

• अहिरवार • कोरवा • उराँव • बिंझीया • भतरा • कँवर • कमार • माड़िय • मुड़िया • भैना • भारिया • बिंझवार • धनवार • नगेशिया • मंझवार • खैरवार • भुंजिया • पारधी • खरिया • गांड़ा या गड़वा • बियार • नमोसुद्र इत्यादि

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FAQ

Q. छत्तीसगढ़ में कितने प्रतिशत जनजातियां रहती है?

Ans: छत्तीसगढ़ राज्य का लगभग एक तिहाई जनसंख्या जनजातियों की है। 16 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जातियों की है जबकि 42 प्रतिशत जनसंख्या अन्य पिछड़ी जातियों की है। इसकी 80 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और आजीविका के साधन के रूप में मुख्यतः कृषि पर निर्भर करती है।

Q. छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति की संख्या कितनी है?

Ans: राज्य की कुल जनसंख्या 2,08,33,803 है। राज्य में कुल 44 अनुसूचित जातियाँ निवास करती है और इस प्रकार राज्य की कुल जनसंख्या का 11.6 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति का है।

Q. छत्तीसगढ़ में आदिवासी की जनसंख्या कितनी है?

Ans: छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति वर्ग के कुल पुरुष जनसंख्या 85118, महिला जनसंख्या 88859 इस प्रकार कुल जनसंख्या 173977 है। इसी प्रकार परियोजना क्षेत्र में कुल 3350 कमार परिवार निवासरत है, जिनकी कुल जनसंख्या 14285 एवं कुल 1606 भुंजिया परिवार निवासरत है.

Q छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा कौन सी जाती है?

Ans: जाति-धर्म के आधार पर छत्तीसगढ़ की जनसंख्या? जाति के आधार पर छत्तीसगढ़ की जनसंख्या पर नजर डाले तो 93.25 प्रतिशत हिन्दू, 2.02 प्रतिशत मुस्लिम, 1.92 प्रतिशत क्रिश्चियन, 0.27 प्रतिशत सिख, 0.28 प्रतिशत बुद्धिस्ट, 0.24 प्रतिशत जैन निवास करते हैं जबकि अन्य जाति के 1.94 प्रतिशत लोग छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं।

Q. छत्तीसगढ़ में आदिवासी विकासखंड कितने हैं?

Ans: इसमें बस्तर, नरायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर,सुकमा ,सूरजपुर , बलरामपुर, कोंडागांव, कांकेर, सरगुजा, कोरिया, कोरबा एवं जशपुर पूर्ण रूप से आदिवासी उपयोजना क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। राज्य में कुल 146 विकासखंड हैं, इनमें आदिवासी विकासखंडों की संख्या 85 है।

Q. छत्तीसगढ़ में कौन कौन सी जाति पाई जाती है?

Ans: छत्तीसगढ़ राज्य एक जनजाति बाहुल्य राज्य है, छत्तीसगढ़ में कुल 42 जनजातियां पाई जाती है, छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजाति गोंड है, इसके अतिरिक्त कँवर, बिंझवार, भैना, भतरा, उरांव, मुंडा, कमार, हल्बा, बैगा, भरिया, नगेशिया, मंझवार, खैरवार और धनवार जनजाति भी काफी संख्या में है।

Q. छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति की संख्या कितनी है?

Ans: छत्तीसगढ़ राज्य की कुल जनसंख्या 2,08,33,803 है। राज्य में कुल 44 अनुसूचित जातियाँ निवास करती है और इस प्रकार राज्य की कुल जनसंख्या का 11.6 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति का है। छत्तीसगढ़ राज्य में सर्वाधिक अनुसूचित जाति वाला जिला रायपुर एवं सबसे कम अनुसूचित जाति वाला जिला दंतेवाड़ा है।

Q.छत्तीसगढ़ में कहाँ और कैसे जनजातियों द्वारा झूम खेती की जाती है?

Ans: इस जनजाति के लोग छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़, लैलूंगा, तमनार विकासखण्ड में, जशपुर जिले के बगीचा, कांसाबेल, दुलदुला, पत्थलगांव विकासखण्डों में, कोरबा जिले के कोरबा, पोड़ी उपरोड़ा, पाली विकासखण्ड तथा बिलासपुर जिले के कोटा व मस्तूरी विकासखण्ड में निवासरत हैं।

Q. छत्तीसगढ़ में झूम खेती कैसे की जाती है?

Ans: स्थानांतरित कृषि या झूम कृषि के तहत पहले वृक्षों तथा वनस्पतियों को काटकर उन्हें जला दिया जाता है| इसके बाद साफ की गई भूमि की पुराने उपकरणों (लकड़ी के हलों आदि) से जुताई करके बीज बो दिये जाते हैं। कुछ वर्षों (प्रायः दो या तीन वर्ष) तक जब तक मृदा में उर्वरता बनी रहती है, इस भूमि पर खेती की जाती है।

Q. जनजातीय समाज में जीवनसाथी प्राप्त करने की कितनी पद्धतियां हैं?

Ans: लोग सामाजिक परंपरा और संस्कृति के अनुरूप आयोजन कराते है। संताल समाज में विवाह को 'बापला' कहा जाता है। इस जनजाति में जीवन साथी के चुनने के बारह तरीके हैं।

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