छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय उद्यान एवं अभ्यारण | National Parks and Sanctuaries CG

छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय उद्यान  एवं अभ्यारण – National Parks and Sanctuaries

छत्तीसगढ़ राज्य के राष्ट्रीय उद्यानों का कुल क्षेत्रफल 2929 वर्ग किमी तथा अभ्यारण्यों का कुल क्षेत्रफल 3577 वर्ग किमी है। इन दोनों का सम्मिलित क्षेत्रफल 6506 वर्ग किमी है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल (135191 वर्ग किमी) का 4.81 प्रतिशत है। यह राज्य के कुल वन क्षेत्र ( 59772 वर्ग किमी ) का 10.88 प्रतिशत है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यान

विषय-सूची

1. इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान (Indravati National Park )

  • इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के बीजापुर जिले में स्थित है। यह दुर्लभ जंगली भैंसे की अंतिम आबादी वाली जगहों में से एक है। इसका क्षेत्रफल 1258 वर्ग किलोमीटर है।
  • यह राष्ट्रीय उद्यान छत्तीसगढ़ राज्य का एकमात्र ‘टाइगर रिजर्व’ है। इंद्रावती नदी के किनारे बसे होने के कारण इसका नाम इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान है।
  • इंद्रावती को 1981 में ‘राष्ट्रीय उद्यान’ का दर्जा प्राप्त हुआ और 1983 में भारत की प्रसिद्ध ‘प्रोजेक्ट टाइगर नामक योजना’ के तहत टाइगर रिजर्व घोषित किया गया।
  • यहा प्रमुख रूप से जंगली भैंसे, बारहसिंगा, बाघ, चीते, नीलगाय, सांभर, जंगली कुत्ते, जंगली सूअर, उड़ने वाली गिलहरियां, साही, बंदर और लंगूर आदि अन्य अनेक जीव-जंतु पाए जाते हैं।

दर्शनीय स्थल –

भद्रकाली : भोपालपटनम से ७० कि.मी. की दूरी पर भद्रकाली नामक स्थान पर इंदरावती एवं गोदावरी नदी का संगम है। यह स्थान बहुत ही खुबसूरत है। पर्यटक इस स्थान पर पिकनीक का आनंद लेते है।

2. कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (Kanger Valley National Park)

  • कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान का कुल क्षेत्रफल 200 वर्ग कि.मी. है जो तीरथगढ से लेकर पूर्व ओडिशा सीमा तक फैला है. अत्यंत मनोहारी दृश्यावली अपने अंचल में समेटे, कांगेर घाटी प्रसिद्द आदिवासी संस्कृति स्थली जगदलपुर से मात्र 27 कि.मी. की दूरी पर स्थित है यह एक ‘बायोस्फीयर रिजर्व’ है।
  • यह नेशनल पार्क भारत के सर्वाधिक सुंदर और मनोहारी नेशनल पार्कों में से एक है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और अनोखी समृद्ध जैव विविधता के कारण प्रसिद्ध है। इसे 1982 में ‘नेशनल पार्क’ का दर्जा दिया गया।
  • वन्य जीवन और पेड़ पौधों के अलावा पार्क के अंदर पर्यटकों के लिए अनेक आकर्षण हैं। जैसे -कुटुमसार की गुफाएं, कैलाश गुफाए, डंडक की गुफाए और तीर्थगढ़ जलप्रपात।कांगेर धारा और भीमसा धारा,दो सुंदर और अद्भुत पिकनिक रिजॉर्ट हैं।
  • यहां के घने वन, लतायें-कुंज, बांस एवं बेलाओं के झुरमुट, रमणीक पहाडि यां, तितलियां, चहकते पक्षी, रहस्यमयी गुफायें, सुन्दर जलप्रपात, सर्वत्र नदी-नाले में कलख करता जल एवं बिखरे हुए दरहा आपको अपलक निहारने एवं अप्रितम आनन्द में डूब जाने के लिये मजबूर कर देगा ।

दर्शनीय स्थल –

A. कोटमसर गुफा (Kotamsar Guffa)

  • ये वर्ष 1900 में खोजी गई तथा वर्ष 1951 में डॉ. शंकर तिवारी ने सर्वेक्षण किया । इसका मुख्य मार्ग 330 मीटर लम्बा है तथा 20 से 72 मीटर चौड़ा है ।
  • यह गुफा स्टेलटाईट और स्टेलेमाईट स्तंभों से घिरी हुई है |इस गुफा का प्रवेश द्वार 5 फीट ऊँचा और 3 फीट चौड़ा है, इसकी दीवारों पर हाथी की सूंड सी रचनायें (ड्रिप स्टोन) जमीन से उठती (स्टेलेग्माइट) एवं छत से लटकती (स्टेलेक्टाइट) शुभ्र धवल चूने के पत्थर की संरचनायें प्रमुख आकर्षण का केन्द्र है ।
  • ये संरचनायें अत्यंत धीमी गति से बनती है तथा इनका बनना अभी भी जारी है । गुफा के निर्माण में प्रकृति को कितना समय लगा होगा, बता पाना कठिन है ।
  • गुफा के 5 चैम्बर्स है जिनमे से कई अंधेरी खाई की आकृति के हैं,जो कि पत्थरों से ढाका हुआ है |जिस पर चोट करने से खोखली आवाज़ आती है| गुफा के कई साइड कम्पार्टमेंट है । गुफा के धरातल में कई छोटे-छोटे पोखर है । जिनमें प्रसिद्ध अंधी मछलियां एवं मेंढक पाये जाते है ।
  • इसके अतिरिक्त गुफा में अंधेरे में पलनेवाले झींगुर, सांप, मकडी, चमगादड, दीमक आदि पाये जाते है । गुफा के अंत में स्टेलेग्माइट शिवलिंग है । गुफा में सोलार लेम्प एवं गाइड की सहायता से घूमा जाता है ।

B. कैलाश गुफा (Kailas Guffa)

  • इसकी खोज अप्रेल 1993 में राष्ट्रीय उद्यान के अधिकारी एवं कर्मचारियों द्वारा की गई । कोटमसर वनग्राम से लोवर कांगेर वैली रोड पर 16 कि.मी. दूर स्थित है|यह गुफा 200 मीटर लंबी एवं 35-50 मीटर गहरी है । गुफा के अंदर विशाल दरबार हाल है, जिसमें स्टेलेक्टाइट, स्टेलेग्माइट एवं ड्रिप स्टोन की आकर्षक संरचनायें है ।
  • गुफा के अंदर कैलाश पर्वत के समान नजारा दिखाई देता है ।गुफा के भीतर एक म्यूजिक प्वाइंट है, जहां चूने की संरचनाओं को पत्थर से टकरा कर संगीत का आनन्द लिया जा सकता है । गुफा के अंत में शिवलिंग विद्यमान है। गुफा को सौर उर्जा से आलोकित किया गया है ।

C. दंडक गुफा (Dandak Guffa)

  • इस गुफा की खोज अप्रेल 1995 में की गई। यह गुफा 200 मीटर लंबी 15-25 मीटर गहरी है । इस गुफा में दो खंड है । प्रथम खंड में प्रवेश करने के पश्चात एक विशाल सभागृह दिखाई देता है ।
  • इसमें दैत्याकार ड्रिप स्टोन की ठोस एवं शुभ्र संरचनायें है । दूसरे खंड में पहुंचने के लिये घुटने के बल सरक कर जाना पड़ता है । इसमें गहन अंधकार में डूबा हुआ एक कुंआ सी संरचना हैं तत्‌पश्चात स्टेलेक्टाइट की श्वेत एवं सुन्दर संरचनायें दिखाई देती है ।
  • इसमें भी सोलार लेम्प का उपयोग किया जाता है ।

D. तीरथगढ जलप्रपात (Tirathgarh Falls)

  • यह जल प्रपात जगदलपुर के दक्षिण पश्चमी दिशा में 39 कि.मी की दूरी पर स्थित है या सुरम्य जल प्रपात मुनगाबहार नदी से 300 फीट नीचे की ओर कई स्तरों में गिरता है |
  • जलप्रपात के तीनों चरणों तक नीचे उतरने के लिये कांक्रीट कर सीढि यां बनी हुई है । यहां जल प्रपात के नीचे शिव – पार्वती मंदिर भी स्थित है ।
  • पर्यटकों के विश्राम के लिये पर्यटक शेड एवं घाटी व जल प्रपात का नजारा लेने के लिये वाच टावर भी बनाये गये है ।

E. कांगेर धारा (Kanger Dhara)

  • कोटमसर ग्राम के समीप कांगेर नदी लघु जल प्रपात है, जो कई स्थानों पर झरनों के रूप में गिरता है । यहां की पथरीली चट्टानें, उथले जलकुण्ड, वादियां एवं कल-कल अविरल बहते जल प्रवाह की ध्वनि मुख्य आकर्षण है ।

F. भैंसा दरहा (Baisa Darha)

  • कांगेर नदी पर चार हेक्ट क्षेत्र में फेला हुआ विशाल प्राकृतिक झील का जलक्षेत्र है, जिसे भैंसा दरहा कहते है । यह घने बांस के वनों एवं झुरमुटों के बीच स्थित है ।
  • कांगेर नदी पार्क में कोटमसर से अल्हड़तापूर्वक कूदती-फांदती हुई यहां पर ठहर कर एकदम शंत हो जाती है । यह मगरों एवं कछुओं का नैसर्गिक वास है ।
  • इस दरहा की ज्ञात गहराई 20 मीटर है । इसमें उतरना खतरे से खाली नहीं है । यह झील पूर्वी दिशा में शबरी (कोलाब) नदी में समा जाती है ।

3. गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान (Guru Ghasidas National Park)

  • छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया एवं सूरजपुर जिले में स्थित गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान छत्तीसगढ़ शासन के अधिसूचना क्रमांक F-7/24 व.स./2001 दिनांक 07 अगस्त 2001 द्वारा अस्तित्व में आया |
  • इसके पूर्व 1981 से यह पूर्ववर्ती संजय राष्ट्रीय उद्यान सीधी का भाग था |इसका कुल क्षेत्रफल 1440.705 वर्ग कि.मी. है | यह क्षेत्र 23० 30 अक्षांश से 23० 53 एवं 81० 48 से 82० 45 से देशान्त में फैला हुआ है |
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से यह प्रदेश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है |

दर्शनीय स्थल –

A. गांगीरानी माता की गुफा (Gagirani Guffa)

  • यह रॉक कट गुफा है जहां गांगीरानी माता विराजमान है।
  • गुफा के पास बहुत बडा तालाब है जिसमें सालों भर पानी रहता है।
  • यहां रामनवमी के अवसर पर मेला लगता है।

B. नीलकंठ जलप्रपात (Nilkanth Falls)

  • सघन वन से घिरा हुआ 100 फीट से अधिक ऊंचाई से गिरता जलप्रपात है।
  • यहां का विशाल शिवलिंग भी प्रमुख आकर्षण केन्द्र है।

C. सिद्धबाबा गुफा (Sidhbaba Guffa)

  •  सर्प देवता स्वरूप में सिद्धबाबा का निवास स्थल है.
  • यहां रामनवमी के दिन मेला लगता है।
  • उस दिन सर्प देवता बाहर निकलकर भक्तों से दूध पीते हैं यहॉं लोग मन्नत भी मांगते हैं।

D. च्यूल जल प्रपात (Chul Falls)

  • यह च्यूल से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर सघन वन से घिरा लगभग 50 फीट की ऊंचाई से गिरता सदाबहार जल प्रपात है।
  • नीचे जल कुंड है जिसमें जलक्रीडा का आनंद लिया जा सकता है।

E. खोहरा पाट (Khoara Falls)

  • यह च्यूल से लगभग 20 कि.मी. है यह स्थान पाइंट हिलटाप पर है .जहां खोहरा ग्राम बसा है।
  • यहां से सघन वन, एवं घाटी का विहगंम दृश्य देखते ही बनता है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के वन्य जीव अभ्यारण

1. बारनावापारा वन्य जीवन अभयारण्य (Barnavapara Sanctuaries)

  • बारनावापारा वन्य जीवन अभयारण्य –244.66 वर्ग किमी. के क्षेत्रफल में फैला बारनवापारा अभ्यारण्य सन्‌ 1973 में अस्तित्व में आया। इस अभ्यारण्य का नाम बारनवापारा गांव के नाम पर पड़ा है। यह अभ्यारण्य रायपर से 70 कि.मी. दूर (रायपुर-संबलपुर मार्ग पर ) स्थित है।
  • महानदी की सहायक नदियां यहां के लिए जलस्रोत हैं। बालमदेही नदी एवं जोंक नदी अभ्यारण्य से होकर बहती है। इस अभ्यारण्य में 22 वनग्राम है जिसमें मुख्यतः आदिवासी लोग निवास करते है।
  • अभ्यारण्य के घने वनों को टीक, साल और मिश्रित वनों में बांटा जा सकता है। वन में सीधे तने वाले भव्य टीक (टेक्टोना ग्रांडिस) के साथ अन्य वृक्ष जैसे साजा (टर्मिनालिया टोमेन्टोसा), बीजा (टेरोकार्पस मार्सुपियम), लेंडिया (लेगरस्ट्रोमिया पार्विफ्लोरा), हल्दु (अदीना कार्डिफोलिया), धाओरा (आनोगेसिस लेटिफोलिया), सलई (बासवेलिया सेराट), आंवला (इंब्लिका अफिकीनालिस), अमलतास (केसिया फिस्तुला) आदि शामिल हैं।
  • यहां वनों में बांस भी देखा जा सकता है। सफेद कुतु (स्टेरकुलिया यूरेअस) बरबस ही किसी का भी ध्यान आकर्षित कर लेता है। हरियाली के मध्य, अकेले खडे इन पेडों की छटा निराली है।
  • इस अभ्यारण्य में शेर तेन्दूआ भालू गौर चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली शूकर लोमडी, धारदार लकड बग्घा आदि दिखते हैं। बारनवापारा में १५० से भी अधिक प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं।
  • इनमें प्रवासी पक्षी भी शामिल हैं। इनमें से कुछ हैं जंगली मुर्गे, फेजेन्ट, बुलबुल, ड्रोंगो, कठफोड वा आदि मुख्य हैं।

दर्शनीय स्थान

A. देवधारा (Devdhara)

  • देवपुर से 2 कि.मी. की दूरी पर यह जलप्रपात स्थित है।
  • बांस एवं मिश्रित वन से घिरा यह स्थान बहोत ही मनोरम है।
  • यहां पर्यटक पिकनीक मनाने आते है।

B. तेलईधारा (Telaidhara)

  • बारनवापारा से 10 कि.मी. दूर यह मनोरम स्थान है।
  • यह स्थान बांस एवं साल के वन से घिरा हुआ है एवं बडा ही रमणीक है।
  • एक जलप्रपात यहां बहता है।
  • पर्यटक यहां पिकनीक का आनंद ले सकते है।

2. सेमरसोत अभयारण्य (Semarsot Sanctuaries)

  • सेमरसोत अभयारण्य छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा ज़िले के मुख्यालय अम्बिकापुर से 58 किमी. की दूरी पर अम्बिकापुर-रामानुजगंज मार्ग पर स्थित है। इस अभयारण्य में सेंदरी, सेमरसोत, चनआन, सॉंसू, सेंन्दुर एवं मोगराही नदियों का जल प्रवाहित होता है।
  • सेमरसोत अभयारण्य के अधिकांश क्षेत्र में सेमरसोत नदी बहती है। यही कारण है कि इस अभयारण्य का नाम ‘सेमरसोत अभयारण्य’ पडा है।इस अभ्यारण्य में साल, साजा, बीजा, शीसम, खम्हार, हल्दू एवं बांस के वन पाये जाते है।इस अभयारण्य का कुल क्षेत्रफल 430.36 वर्ग किमी. तक है।
  • सेमरसोत अभ्यारण्य को सौंदर्यशाली बनाने में साल, आम, तेन्दू आदि वृक्षों के कुंज सहायक है।अभ्यारण्य में जंगली जंतुओं में शेर, तेन्दुआ, गौर, नीलगाय, चीतल, सांभर, सोनकुत्ता, भालू, कोटरी, सेही स्वछंद विचरण करते देखे जा सकते हैं।इस अभ्यारण्य में सफ़ेद मूसली, ब्राम्हनी, तिखुर, भोजराज, हरजोर, बायबेरिंग आदि औषधि के पौधे भी पाये जाते है।
  • सेमरसोत अभयारण्य नवंबर से जून तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है।रात्रि विश्राम हेतु वन विश्राम गृह, सेमरसोत एवं पस्त का निर्माण कराया गया है।
  • सेमरसोत अभयारण्य में अनेक स्थानों पर ‘निगरानी टावरों’ का निर्माण किया गया है, जिससे पर्यटक प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले सके।इस क्षेत्र के अन्दर तीन वनग्राम है- झलरिया, दलधोवा और पस्तआ।

3. भारेमदेव वन्य जीवन अभयारण्य (Bhoramdev Sanctuaries)

  • यह अभ्यारण्य कवर्धा से 22 कि.मी. की दुरी पर स्थित है। इसका क्षेत्रफल 351.24 वर्ग किमी है।भोरमदेव अभ्यारण्य कान्हा राष्ट्रीय उद्यान एवं चिल्फी बफर जोन के साथ जुडे होने के कारण तथा विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण लगभग सभी वन्य प्राणी वर्गी का प्रतिनिधत्व करता है।
  • यहां शेर (बाघ), तेन्दूआ, लगड बग्घा, जंगली, कुत्ता, भेडि या, गीदड , लोमडी, जंगली बिल्ली, चीतल, कोटरी, सांभर, नीलगाय, जंगली सुअर, वायसन (गौर), लंगुर, लाल मुंह का बंदर, नेवला, खरगोश, बिज्जू आदि जानवर पाये जाते है।

दर्शनिय स्थल

A. भोरमदेव (Bhoramdev)

  • कवर्धा से 18 कि.मी. उत्तर पिश्चम में स्थित 11 वीं शती का चंदेल शैली में बना भोरमदेव मंदिर अपने उत्कृष्ट शिल्प व भव्यता की दृष्टि से छत्तीसगढ का खजुराहों कहा जाता है।
  • यह इस क्षेत्र के सर्वाधिक पुनाने मंदिरों में से एक है। जनश्रुतियों के आधार पर भोरमदेव का मंदिर छत्तीसगढ में गोडो के शासन का महत्वपूर्ण स्मारक माना जाता है। किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से यह मंदिर नागवंशियों का होना पाया गया है।
  • भोरमदेव मंदिर छापरी नामक गांव के पास वृत्ताकार मैकेल पर्वत श्रेणियों के बीच घाटी में बना हुआ है। मंदिर के समीप ही एक जलाशय है जो आकर्षण का केन्द्र है।
  • भोरमदेव मंदिर मूलतः विष्णु को समर्पित मंदिर था बाद में वहां शिवलिंग स्थापित कर दिया गया। भूमितल से सौ फुट उंचे इस मंदिर की बाह्‌य दीवारों पर अत्यंत आकर्षक मिथुन मूर्तिया हाथी घोडे नृत्यरत स्त्री-पुरूष गणेश नटराज इत्यादि की मूर्तियां स्थित है सम्प्रति भोरमदेव मंदिर पुरातत्व विभाग के देखरेख में है।
  • यहां प्रतिवर्ष मार्च माह में “भोरमदेव उत्सव” का आयोजन किया जाता है।

B. मडवामहल (Madvamahal)

  • भोरमदेव मंदिर से आधा कि.मी. की दूरी पर चौरग्राम के समीप पत्थरों से निर्मित एक शिवमंदिर है। ऐसी जनश्रुति है कि इस मंदिर में विवाह संपन्न कराए जाते थे.
  • अतः विवाह मंडप के रूप में प्रयुक्त होने के कारण मंडवा मडल कहा जता है। मंदिर की बाह्‌य दीवारों पर मिथुन मूर्तियां बनी हुई है।
  • गर्भगृह का द्वार काले चमकदार पत्थरों का बना है जिस पर आकर्षक प्रतिमाएं बनी हुई है।

C. छेरी महल (Cheri Mahal)

  • भोरमदेव मंदिर के समीप १ कि.मी. की दूरी पर एक छोटा शिवमंदिर है जो 14 वीं शती का बना हैं.
  • मंदिर की चौखट काले पत्थरों की बनी है जिसके उपर आकर्षक भित्तचित्र बने है।
  • गर्भगृह में गणेश प्रतिमा रखी हुई है।

D. रानीदहरा (Rani Darha)

  • कबीरधाम जिला मुख्यालय से जबलपुर मार्ग पर 34 कि.मी. दूरी पर रानीदहरा नामक जल प्रपात स्थित है।
  • रियासतकाल में राजा रानियां को मनोरंजन के लिए रानीदहरा लाया करते थे।
  • तीनों ओर पहाडो से घिरे इस जगत पर 90 फीट की उंचाई पर स्थित जलप्रपात बर्बस ही लोगों गको आकृष्ट करता है।
  • रानीदहरा मैकल पर्वत के आगोस में स्थित है।

4. उदंती वन्य जीवन अभयारण्य (Udyanti Sanctuaries)

  • उदंती अभ्यारण की स्थापना वर्ष 1983 में हुई। इस अभ्यारण्य का कुल क्षेत्रफल 237.28 वर्ग किमी. है।
  • छत्तीसगढ़ उडीसा से लगे रायपुर-देवभोग मार्ग पर यह अभयारण्य रायपुर से 162 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।
  • पिश्चम से पूर्व की ओर बहने वाली उदंती नदी के नाम पर इस अभयारण्य का नामकरण हुआ है।
  • यह अभयारण्य जंगली भैंसों की बहुतायत के लिये प्रसिद्ध है।

दर्शनीय स्थल –

A.गोडेना जलप्रपात (Godena Falls)

  • यह जलप्रपात कर्रलाझर से 8 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।
  • यह स्थान बहोत ही मनोरम एवं एकांत में है जहां झरने की कलकल ध्वनी से पहाडी से बहती हुई सुनाई देती है।
  • यह पर्यटकों के लिये पिकनीक का एक उत्तम स्थान है।

B. देवधारा जलप्रपात (Devdhara Falls)

  • तौरेंगा से 12 कि.मी. की दूरी पर यह जलप्रपात है।
  • यहां पहुचने के लिये 1.5 कि.मी. पैदल चलना पड़ता है।
  • यह स्थान भी बहोत ही खुबसूरत है एवं यह बांस एवं मिश्रित वन से घिरा हुआ है।

5. बादलखोल वन्य जीवन अभयारण्य (Badalkhol Sanctuaries)

  • जशपुर जिले में यह अभ्यारण्य जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यह आरक्षित वनखण्ड पूर्व में जशपुर महाराज का शिकारगाह था। भौगोलिक दृष्टि से यह अभ्यारण्य 22०52” से 23०30” उत्तर अक्षांश से 83०44” से 85०57” पूर्व देशांश पर स्थित है।
  • बादलखोल अभ्यारण्य कुल 32 वनकक्षों का है, जिसका कुल क्षेत्रफल 104.454 वर्ग किलोमीटर है। अभ्यारण्य का संपूर्ण क्षेत्र ईब एवं डोड़की नदी का जलागम क्षेत्र है। यह अभ्यारण्य 1975 में बनाया गया था।
  • इस अभ्यारण्य के अंदर चार वनग्राम है जिसमें 118 परिवार निवास करते है। वनग्राम में 90 प्रतिशत लोगा अनुसूचित जाति एवं जनजाति के है।
  • इस अभ्यारण्य में मुख्यतः साल एवं मिश्रित प्रकार के वन है जिसमें साजा, धावडा, सलई, बीजा, खम्हार, हल्दू, अर्जुन, महुहा, तेन्दू, आंवला, चार, तिनसा, कर्रा, लेण्डिया आदि के पौधे पाये जाते है।
  • औषधिय पौधे जैसे – सतावर, तिखरु, काली/सफेद मूसली, रामदातुन, चिरायता प्रचुर मात्रा में मिलती है। इस अभ्यारण्य में तेन्दूआ, चितल, कोटरी, जंगली सुअर, जंगली बिल्ली, भालू, लकड बग्घा, सियार, सेही, खरगोश, गोह, मोर आदि वन्यप्राणी पाये जाते है।
  • इस अभ्यारण्य में बिहार एवं उडीसा से आने वाले हाथियों के झुण्ड इस वनक्षेत्र को कोरिडोर के रूप में इस्तेमाल करते है।
  • इस अभ्यारण्य में पर्यटकों के मनोरंजन हेतु निम्नानुसार टे्रक्रिग रूट बनाये गये हैं जिस पर पर्यटक जाकर वन एवं वन्य प्राणियों का आनंद उठा सकते हैं।

6. तमोर पिंगला अभयारण्य (Tmor Pingla Sancturies)

  • यह राज्य के सूरजपुर ज़िले में स्थित है। यह इस राज्य का सबसे बड़ा अभ्यारण है।इसका कुल क्षेत्रफल 608.27 वर्ग किमी. है। साल और मिश्रित वनों से आच्छादित और वर्ष 1978 में स्थापित.
  • इस अभयारण्य का सम्पूर्ण क्षेत्र तमोर और पिंगला नामक वनखण्डों से निर्मित है, जो सरगुजा ज़िले के उत्तर-पिश्चम में स्थित है।
  • रेहण्ड नदी इस अभयारण्य की दक्षिण-पिश्चम सीमा बनाती है, तथा वहीं दूसरी ओर मोरन नदी अभयारण्य की उत्तरी सीमा का निर्माण करती है।
  • इस अभयारण्य का समस्त क्षेत्र पहाड़ी, घने जंगलों और नदियों से घिरे होने के कारण बड़ा ही मनोहारी परिदृश्य प्रस्तुत करता है।
  • इस अभयारण्य में प्रमुख रूप से शेर और तेन्दुआ जैसे मुख्य मांसाहारी वन्य प्राणियों के अतिरिक्त गौर, नीलगाय, सांभर, चीतल, भालू, जंगली सुअर, चिंकारा, कोटरी, लंगूर तथा बंदर आदि भी बड़ी तादाद में पाये जाते है। पक्षियों में मोर, नीलकंठ, तोता, कोयल, जंगली मुर्गा, भृंगराज, बुलबूल, दूधराज, पपीहा, तीतर और मैना आदि दिखते हैं।
  • वनों से आच्छादित इस अभयारण्य में साल, साजा, धावडा, महुआ, तेन्दू, अर्जुन, तिन्सा, हल्दू, आंवला, चारकारी, बांस, धवई और घोट आदि प्रजातियों के पेड-पौधे और वृक्ष बहुतायत मात्रा में देखने को मिलते है। वन वर्गीकरण के आधार पर यह क्षेत्र शुष्क प्रायिद्वपीय साल वन और उत्तरी शुष्क मिश्रित पर्णपाती वन के अंतर्गत आता है।
  • इस अभयारण्य क्षेत्र में 8 राजस्व ग्राम आते है। इन ग्रामों में मुख्यतः गोड, पण्डी, चेरवा, कोडकू और खैरवार जनजातियाँ निवास करती है।
  • तमोर पिंगला अभयारण्य में वन्य प्राणियों और ख़ूबसूरत मनोहारी दृश्यों के अतिरिक्त तमोर वन खण्ड की खड़ी पहाड़ियों और रेहण्ड नदी का विहंगम दृश्य भी शानदार द्रश्य प्रस्तुत करता है और मन को आकर्षित कर देता है। इस अभयारण्य में इसके साथ-साथ ‘देवी झिरिया’ का मंदिर और यहाँ की नजदीकी पहाड़ी से बारह महिने कल-कल करता और बहता हुआ जल भी आनंद की अनुभूति का एहसास कराता है।
  • अभयारण्य के दर्शनीय स्थलों में ‘बेंगाची पहाड’, लेफरी घाट, सुईलना, घोड़ापाट, माल्हन देवी स्थल, कुदरू घाघ और केदू झरिया आदि स्थल हैं। ‘तमोर पिंगला अभयारण्य’ में भ्रमण का सबसे ठीक समय नवंबर से जून तक का महिना है।

7. भैरमगढ़ जीव अभ्यारण (Bhairamgadh Sancturies)

8. 88

  • भैरमगढ़ वनभैंसा अभ्यारण क्षेत्र का विस्तार उत्तर से दक्षिण 12 कि.मी एवं पूर्व से पश्चिम 19 कि.मी. है जो कि 18० 55 से 19० 10 अक्षांश एवं 80० 50 से 81० 05 देशांश के मध्य स्थित है |
  • इसका भोगौलिक क्षेत्रफल 138.95 वर्ग कि.मी है |इसके अंतर्गत आरक्षित वन के 33 कक्ष जिनका क्षेत्रफल 119.47 वर्ग कि.मी. एवं संरक्षित वन के 05 कक्ष जिनका क्षेत्रफल 07.36 वर्ग कि.मी. एवं असीमांकित एवं राजस्व क्षेत्र का 12.12 वर्ग कि.मी क्षेत्र सम्मिलित है |
  • भैरमगढ़ अभ्यारण की उत्तरी सीमा पर बहने वाली इन्द्रावती नदी के किनारे का दृश्य बड़ा ही मनोरम है,पर्यटक इस नदी के किनारे पिकनिक का आनंद ले सकते हैं | साथ ही इस अभ्यारण के सागौन,साजा,बांस आदि के वन देखने लायक है |

8. पामेड वन्य जीव अभ्यारण्य (Pamed Sancturies)

  • पामेड़ वन भैंसा का विस्तार पूर्व से पश्चिम 32 कि.मी. एवं उत्तर से दक्षिण 21 कि.मी. में 80 15 से 80 45 अक्षांश एवं 18 15 से 18 25 देशांश के मध्य स्थित है |
  • इसका भौगोलिक क्षेत्रफल 442.23 वर्ग कि.मी है | इसके अंतर्गत आरक्षित वन के 96 कक्ष जिनका क्षेत्रफल 275.42 वर्ग कि.मी एवं संरक्षित वन के 49 कक्ष जिनका क्षेत्रफल 165.27 एवं असीमांकित एवं राजस्व क्षेत्र का 1.54 वर्ग कि.मी. क्षेत्र सम्मिलित है |
  • तलपेरू नदी का किनारा एवं चिंतावागुनदी के किनारे का दृश्य बड़ा ही मनोरम है पर्यटक इस नदी के किनारे पर पिकनिक का आनंद ले सकते हैं साथ ही पांच पहाडी से घिरे इस अभ्यारण में साल, साजा के वृक्ष इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगाते हैं |

9. गोमर्डा वन्य जीव अभ्यारण्य (Gomarda Sancturies)

  • रायगढ़ से 52 कि.मी. दूर सारगढ के पास गोमर्डा अभ्यारण्य स्थित है। प्रारंभिक गठन के समय (1975) गोमर्डा अभ्यारण्य का क्षेत्रफल मात्र 133.32 वर्ग कि.म. था।
  • वन्य प्राणियों की बढ ती हुई संख्या भविष्य में उनके विकास और परिवर्धन की संभावनाओं को देखते हुए अभ्यारण्य क्षेत्र का विस्तार 1983 में किया गया, वर्तमान में गोमर्डा अभ्यारण्य का कुल क्षेत्रफल 277.82 वर्ग कि.मी. है।
  • अभ्यारण्य का अधिकाश भाग पहाडी है। राठन बुढाघाट, गोमर्डा, दानव करवट दैहान आदि पहाडियॉं इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौन्दर्य की अभिवृद्धि करती है, साथ ही वन्य प्राणियों के लिए प्राकृतिक वास स्थलों का निर्माण भी। लात, मनई आदि छोटी-छोटी जल प्रवाही नदियां इस क्षेत्र के वन्य जीवों की तृष्णा शांत करते हुए तटवर्ती क्षेत्रों को हरियालीपूर्ण विविधता प्रदान करती है। इस अभ्यारण्य में 26 राजस्व एवं 2 वन ग्राम हैं।
  • गोमर्डा अभ्यारण्य क्षेत्र मुख्यतः उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों से आच्छादित है। यत्र तत्र बांस के कुछ झुरमुट भी पाए जाते है।
  • पर्वतीय ढलानों और शुष्क पठारों में वन सस्य का अभाव सा परिलक्षित होता है, किन्तु मैदानों भाग और घाटियों में अच्छे सघन वन कहीं-कहीं देखने को मिलते है। अभ्यारण्य में मुख्यतः साजा, धावरा, तेन्दू आचार, मिर्रा, महुआ, कर्रा, सलई, बीजा, ऑंवला, खम्हार, दोटा बेल, सेमर, हरसिंगार, धवई, कोरिया, बेर, पापडा इत्यादि के वृक्ष पाये जाते है।

10. सीतानंदी वन्य जीव अभयारण्य (Sitanadi Sancturies)

  • यह राज्य के धमतरी ज़िले में स्थित एक सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण वन्य जीव अभयारण्‍य है। इस अभयारण्य की स्थापना वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत 1974 में की गई थी।
  • अभयारण्य में 556 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में अत्यंत ऊंचे-नीचे पहाड़ और पहाड़ी तराईयाँ हैं, जिनकी ऊंचाई 327-736 मीटर के बीच है।
  • यह सुंदर अभयारण्य सीतानंदी नदी के नाम पर बनाया गया है, जो इस अभयारण्‍य के बीच से बहती है और देवकूट के पास महानदी नामक नदी से जुड़ती है।
  • सीतानंदी वन्य जीव अभयारण्य अपने हरे भरे पेड़ पौधों और विशिष्ट तथा विविध जीव जंतुओं के कारण जाना जाता है और यहाँ मध्य भारत का एक उत्कृष्टतम वन्य जीवन बनने की क्षमता है।
  • इस अभयारण्य की वनस्पति में मुख्यत: नम पेनिन सुलर साल, टीक और बांस के वन शामिल हैं।अभयारण्य के अन्य प्रमुख वृक्ष हैं- सेमल, महुआ, हर्र, बेर, तेंदु। यहाँ की हरी भरी वनस्पति में अनेक प्रकार के वन्य जीवन के उदाहरण मिलते हैं।
  • सीतानंदी में पाए जाने वाले प्रमुख वन्‍य जंतुओं में बाघ, चीते, उड़ने वाली गिलहरी, भेडिए, चार सींग वाले एंटीलॉप, चिंकारा, ब्‍लैक बक, जंगली बिल्‍ली, बार्किंग डीयर, साही, बंदर, बायसन, पट्टीदार हाइना, स्‍लॉथ बीयर, जंगली कुत्ते, चीतल, सांभर, नील गाय, गौर, मुंट जैक, जंगली सुअर, कोबरा, अजगर आदि शामिल हैं।
  • अभयारण्य में अनेक प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं, इसमें से कुछ नाम हैं तोते, बुलबुल, पी फाउल, फीसेंट, क्रीमसन बारबेट, तीतर, ट्रीपाइ, रैकिट टेल्‍ड ड्रोंगो, अगरेट तथा हेरॉन्स।
  • इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बाघ अभयारण्य के रूप में विकसित करने की तैयारी भी की जा रही है।
  • सीतानंदी अभयारण्य में जाने पर पर्यटकों को सभी प्रकार के वन्य जीवन का एक मनोरंजक और अविस्मरणीय अनुभव मिलता है, ख़ास तौर पर प्रकृति से प्रेम करने वालों और अन्य जीवन के शौकीन व्यक्तियों को।

11. अचानकमार वन्य जीवन अभयारण्य (Achankmar Sancturies)

  • अचानकमार वन्य जीवन अभयारण्य छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित एक वन्य जीवन अभयारण्य है। अचानकमार वन्य जीवन अभयारण्य को 1975 में तैयार किया गया था।
  • इस अभयारण्य में वैसे तो विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु पाए जाते हैं, किंतु यहाँ बाघों की संख्या सर्वाधिक है।
  • अचानकमार वन्य जीवन अभयारण्य 557.55 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्रफल में फैला है।बिलासपुर वन प्रभाग का उत्तर पश्चिमी वन विकास खण्ड, अचानकमार वन्य जीवन अभयारण्य भारत का एक समृद्ध अभयारण्य है।
  • अचानकमार वन्य जीवन अभयारण्य में अनेक प्रकार के वन्‍य जंतु जैसे चीतल, जंगली भालू, तेंदुआ, बाघ, चीते, पट्टीदार हाइना, केनिस ओरियस भेडिया, स्‍लॉथ बीयर, मेलुरसस, अर्सीनस, भारतीय जंगली कुत्ते, कोऑन, अलपिन्स, चीतल, चार सींग वाले एंटीलॉप, नील गाय, बोसेलाफस, ट्रेगोकेमेलस, चिंकारा, ब्लैक बक, जंगली सूअर और अन्य अनेक पाए जाते हैं।

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