छत्तीसगढ़ के प्रमुख व्यक्तित्व एवं उनके योगदान | Major personalities of Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ के प्रमुख व्यक्तित्व एवं उनके दुआर किये योगदान | Major personalities of Chhattisgarh 

छत्तीसगढ़ के अमर बलिदानी का जवाब नहीं जिन्होंने अपने सहस एवं देश के प्रति किये अपने योगदान सराहनीय है .आज हम कुछ महान व्यक्तियों के बारे में जानेगे. जिनकी देश भक्ति की चाप समूचे देश में छा गया |

1. अमर बलिदानी गेंदसिंह (Gendsingh)

  • छत्तीसगढ़ राज्य का एक प्रमुख क्षेत्र है बस्तर। अंग्रेजों ने अपनी कुटिल चालों से बस्तर को अपने शिकंजे में जकड़ लिया था। वे बस्तर के वनवासियों का नैतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण कर रहे थे। इससे वनवासी संस्कृति के समाप्त होने का खतरा बढ़ रहा था। अतः बस्तर के जंगल आक्रोश से गरमाने लगे।
  • उन दिनों परलकोट के जमींदार थे श्री गेंदसिंह। वे पराक्रमी, बुद्धिमान, चतुर और न्यायप्रिय व्यक्ति थे। उनकी इच्छा थी कि उनके क्षेत्र की प्रजा प्रसन्न रहे। उनका किसी प्रकार से शोषण न हो। इसके लिए वे हर सम्भव प्रयास करते थे; पर इस इच्छा में अंग्रेजों के पिट्ठू कुछ जमींदार, व्यापारी और राजकर्मचारी बाधक थे। वे सब उन्हें परेशान करने का प्रयास करते रहते थे। जब अत्याचारों की पराकाष्ठा होने लगी, तो श्री गेंदसिंह ने 24 दिसम्बर, 1824 को अबूझमाड़ में एक विशाल सभा का आयोजन किया। सभा के बाद गाँव-गाँव में धावड़ा वृक्ष की टहनी भेजकर विद्रोह के लिए तैयार रहने का सन्देश भेजा।
  • वृक्ष की टहनी के पीछे यह भाव था कि इस टहनी के पत्ते सूखने से पहले ही सब लोग विद्रोह स्थल पर पहुँच जायें। 4 जनवरी, 1825 को ग्राम, गुफाओं और पर्वत शृंखलाओं से निकल कर वनवासी वीर परलकोट में एकत्र हो गये। सब अपने पारम्परिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस थे।
  • वीर गेंदसिंह ने सबको अपने-अपने क्षेत्र में विद्रोह करने को प्रेरित किया। इससे थोड़े ही समय में पूरा बस्तर सुलग उठा। सरल और शान्त प्रवृत्ति के वनवासी वीर मरने-मारने को तत्पर हो गये। इस विद्रोह का उद्देश्य बस्तर को अंग्रेजी चंगुल से मुक्त कराना था।
  • स्थान-स्थान पर खजाना लूटा जाने लगा। अंग्रेज अधिकारियों तथा राज कर्मचारियों को पकड़कर पीटा और मारा जाने लगा। सरकारी भवनों में आग लगा दी गयी। शोषण करने वाले व्यापारियों के गोदाम लूट लिये गये। कुछ समय के लिए तो ऐसा लगा मानो बस्तर से अंग्रेजी शासन समाप्त हो गया है।
  • इससे घबराकर अंग्रेज प्रशासक एग्न्यू ने अधिकारियों की एक बैठक में यह चुनौती रखी कि इस विद्रोह को कौन कुचल सकता है ? काफी देर तक बैठक में सन्नाटा पसरा रहा। गेंदसिंह और उनके वीर वनवासियों से भिड़ने का अर्थ मौत को बुलाना था। अतः सब अधिकारी सिर नीचे कर बैठ गये। एग्न्यू ने सबको कायरता के लिए फटकारा। अन्ततः चाँदा के पुलिस अधीक्षक कैप्टन पेबे ने साहस कर इस विद्रोह को दबाने की जिम्मेदारी ली और एक बड़ी सेना लेकर परलकोट की ओर प्रस्थान कर दिया।
  • वनवासियों और ब्रिटिश सेना के बीच घमासान युद्ध हुआ। एक ओर आग उगलती अंग्रेज सैनिकों की बन्दूकें थीं, तो दूसरी ओर अपने धनुषों से तीरों की वर्षा करते वनवासी। बेचारे वनवासी इन आधुनिक शस्त्रों के सम्मुख कितनी देर टिक सकते थे ? फिर भी संघर्ष जारी रहा। 20 जनवरी, 1825 को इस विद्रोह के नेता और परलकोट के जमींदार गेंदसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • अब तो कैप्टन पेबे की खुशी का ठिकाना न रहा; पर वह इतना आतंकित था कि उसने उन्हें बड़े अधिकारियों के सामने प्रस्तुत करने या न्यायालय में ले जाने का जोखिम उठाना भी उचित नहीं समझा। उसने उसी दिन श्री गेंदसिंह को उनके महल के सामने ही फाँसी पर चढ़ा दिया। वीर गेंदसिंह का यह बलिदान छत्तीसगढ़ की ओर से स्वतन्त्रता के लिए होने वाला प्रथम बलिदान था।

नोटगेंदसिंह को बस्तर का प्रथम शहीद कहा जाता है।

इनके किये गए कुछ प्रयास इसप्रकार है –

A. परलकोट विद्रोह ( 1825 ) 

  • नेतृत्वकर्ता – गेंदसिंह (परलकोट का जमींदार)
  • शासक – महिपालदेव।
  • उद्देश्य – अबुझमाड़ियों को शोषण मुक्त करना।
  • प्रतिक – धावड़ा वृक्ष की टहनी।
  • दमनकर्ता – एगन्यू के द्वारा नियुक्त पेबे।
  • परिणाम – गेन्दसिंह को फांसी ( 20 जनवरी 1825 )

2. पं. वामनराव लारवे (Vamanrav Lakhe)

  • वामनराव जी का जन्म 1872 को रायपुर में हुआ था। उनके पिता बलीराम लारवेजी खूब परिश्रमी थे, और खूब परिश्रम करके उन्होंने कुछ गांव भी खरीद लिये थे। बचपन से वामनराव इसी माहौल में बड़े होने के कारण परिश्रम के मूल्य को अच्छी तरह समझते थे। पिता बलीराम जी उन्हें हमेशा कहते थे कि उच्च शिक्षा के लिए सदा कोशिश करनी चाहिए। वे चाहते थे कि उनका बेटा खूब पढ़े।
  • सन् 1913 में रायपुर में रायपुर को-आपरेटिव सेन्ट्रल बैंक की स्थापना हुई। रायपुर जिले में यह प्रथम बैंक था जिसके माध्यम से कृषकों को आर्थिक सहायता पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी। साहुकारों से कृषकों को मुक्ति दिलाने के लिए इस बैंक की स्थापना की गई थी और इस संस्था के जन्मदाता थे हमारे वामनराव बल्लीराम लरवे।
  • रायपुर से उन्होंने मैट्रिक किया। माधवराव सप्रे भी उस समय उसी स्कूल में पढ़ते थे। दोनों में दोस्ती हो गई। सन् 1900 में जब सप्रेजी ने “”छत्तीसगढ़ मित्र” नाम से मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया तो लारवे जी उस पत्रिका के प्रकाशक थे। छत्तीसगढ़ की यह पहली पत्रिका थी। सिर्फ तीन साल तक यह पत्रिका चली पर उन तीन सालों के भीतर ही उस पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण का युग आरम्भ हो गया था।
  • सन् 1904 में लारवे जी ने रायपुर में वकालत शुरु की। उसी साल उन्होंने कानून की परीक्षा पास की थी। उनकी पत्नी जानकी बाई भी उनकी ही तरह जन-सेवा को महत्व देती थीं। लारवे जी ने जब रायपुर में वकालत शुरु की तो उनका मकसद था लोगों के लिए कुछ महत्वपूर्ण काम करना ताकि उनकी दशा में सुधार हो। उनका मकसद पैसे अर्जन करना नहीं था। उनकी पत्नी ने भी हमेशा उनका साथ दिया।
  • लारवे जी कई बार बूढ़ापारा से निर्वाचित हुए, नगर पालिका रायपुर के सदस्य के रुप में। रायपुर नगर पालिका के वे अध्यक्ष भी रहे। रायपुर को-आपरेटिव सेन्ट्रल बैंक जिसके बारे में शुरु में ही कहा गया है, उस बैंक के वे सन् 1913 से 1936 तक मंत्री और सन् 1937 से 1948 तक अध्यक्ष रहे। उस समय के लोग लारवेजी के बारे में बताते वक्त उनके कठोर परिश्रमी चरित्र का जरुर ज़िक्र करते हैं। लोगों का कहना है कि इस बैंक का भवन जो मजबूत और सुन्दर है सिर्फ 37,000 में बनाया गया था और यह लरवे जी के कारण ही सम्भव हुआ था।
  • लारवे जी लैण्ड मार्टगेज बैंक के भी अध्यक्ष थे। सन् 1915 में रायपुर में होमरुल लीग की स्थापना की गई थी। लरवे जी उसके संस्थापक थे। छत्तीसगढ़ में शुरु में जो राजनीतिक चेतना फैली थी, उसमें लारवेजी का बहुत बड़ा योगदान है। अपना सारा जीवन राष्ट्रीय आन्दोलन और सहकारी संगठन में बिताया, सन् 1945 में बलौदा बाजार में किसान को-आपरेटिव राइस मिल की स्थापना की।
  • लारवे जी को अंग्रेजी शासन ने किसानों की सेवाओं के लिए 1916 में “”रायसाहब” की उपाधि दी थी। सन् 1920 में लारवेजी ने “”रायसाहब” की पदवी त्याग करके असहयोग आंदोलन की शुरुआत की। सन् 1920 में नागपुर में महात्मा गांधी ने असहयोग का प्रस्ताव रखा था। लारवेजी उस अधिवेशन से लौटने के बाद स्वदेशी प्रचार में सक्रिय हो गये और “”रायसाहब” की पदवी लौटाकर असहयोग आन्दोलन में सक्रिय हो गये। लोगों ने उन्हें एक उपाधि दी और वह थी “”लोकप्रिय” की उपाधि।
  • सन् 1921 में पं. माधवराव सप्रे ने रायपुर में “”राष्ट्रीय विद्यालय” की स्थापना की। उस विद्यालय के मंत्री लारवेजी बने। लारवेजी खादी का प्रचार करने लगे रायपुर में, रायपुर के आसपास के इलाके में। सन् 1921 में अक्टूबर के महीने में रायपुर में “”खादी सप्ताह” मनाया गया था, जिसके प्रमुख संयोजकों में से एक थे लरवे जी। न जाने कितने लोग उस वक्त उत्साह के साथ खादी पहनने लगे थे।
  • सन् 1930 में जब महात्मा गांधी ने आन्दोलन शुरु किया तो रायपुर में इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे-
  1. पं. वामनराव लारवे,
  2. ठा. प्यारेलाल सिंह,
  3. मौलाना रउफ,
  4. महंत लक्ष्मीनारायण दास,
  5. शिवदास डागा।
  • ये पांचों रायपुर में स्वाधीनता के आन्दोलन में पांचों पाण्डव के नाम से विख्यात हो गये।
  • लारवे जी ने जब एक सभा में अंग्रेजी शासन को गुण्डों का राज्य कहा तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें एक साल की सज़ा तथा 3000 रुपये जुर्माना हुआ।
  • सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में लरवेजी को सिमगा में सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार किया गया और चार महीनों की सजा दी गई। उन्हें नागपुर जेल में रखा गया था। उस वक्त लरवेजी 70 वर्ष के थे।
  • छ: साल बाद जब आजादी मिली तो 15 अगस्त को रायपुर के गांधी चौक में पं. वामनराव लारवे ने तिरंगा झंडा फरहाया। वहां मौजूद लोग लारवेजी के चेहरे पर व्याप्त संतोष और शान्ति के बारे में बताते थे।
  • सन् 1948, 21 अगस्त लारवेजी चले गये इस दुनियाँ से। कुछ ही महीने पहले जो घटना घटी उसने उनके मन की शान्ति को नष्ट कर दिया था – स्तब्ध हो गये थे लरवेजी व्यथा से। तीव्र पीड़ा से समझ नहीं पा रहे थे कि गांधी जी को कोई कैसे मार सकता है और उन्हें अन्दाज़ा हो गया था कि आने वाले दिनों में किस प्रकार के लोग सत्ताधारी होंगे। और वे फिर से आज़ादी को कुचल देंगे।

3. ठाकुर प्यारेलाल सिंह (Thakur Pyarelal Singh)

  • सन् था 1920 । राजनन्दगांव में मिल मजदूरों ने हड़ताल की थी जो 37 दिनों से भी ज्यादा चली थी और मिल अधिकारियों को मजदूरों की सभी मांगें मंजूर करनी पड़ी थीं। वह हड़ताल ठाकुर प्यारेलाल के नेतृत्व में हुई थी। ऐसा कहा जाता है कि पूरे देश में वह पहली हड़ताल थी जो 37 दिनों से भी ज्यादा चली थी। उस हड़ताल के कारण मजदूरों को एक लाख रुपये (वार्षिक) लाभ हुआ था और काम के घंटे कम कर दिये गये थे।
  • इसके ठीक चार साल पहले अर्थात् सन 1916 में ठाकुर प्यारेलाल राजनांदगांव में सूती मिल मजदूरों से एक दिन रास्ते में मिले थे। शाम का समय था, मजदूर बहुत ही थके हुए दीख रहे थे। प्यारेलाल जी उनके साथ बातचीत करने लगे। उन्हें पता चला उनके शोषण के बारे में। 12 घंटे रोज मिल में मजदूरों को काम करना पड़ता था। इतना ही नही उनके साथ अधिकारी भी बहुत बुरी तरह पेश आते थे। उसी शाम ठाकुर प्यारेलाल ने ठान लिया कि वे मजदूरों को संगठित करेंगे और आन्दोलन करेंगे।
  • ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने बचपन से ही एक प्रथम श्रेणी के खिलाड़ी होने के कारण जोश और उमंग के साथ हमेशा ज़िन्दगी जी। गिल्ली-डंडा, क्रिकेट, हाकी, शतरंज सभी खेलों में उनकी रुचि थी, और तैरना तो उन्हें इतना ज्यादा पसन्द था कि वे घंटों तैरते रहते थे।
  • ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21 दिसम्बर सन् 1891 को दैहान नाम के गांव में हुआ था। दैहान गांव राजनांदगांव तहसील में स्थित है। प्रारंभिक शिक्षा उनकी राजनांदगांव में हुई थी। हाईस्कूल के लिए उन्हें रायपुर आना पड़ा। सन् 1909 में उन्होंने मैट्रिक पास की। सन् 1913 में उन्होंने नागपुर से बी.ए. पास किया। सन् 1915 में उन्होंने वकालत पास की और उसी साल उन्होंने वकालत आरम्भ कर दी।
  • ठाकुर प्यारेलाल सोलह वर्ष की उम्र से ही स्वदेशी कपड़े पहनने लगे थे। उस वक्त वे कुछ क्रांतिकारियों से मिले थे जो बंगाल के थे। तबसे उन्होंने ठान लिया था कि देश सेवा ही उनके जीवन का मकसद होगा। सन् 1909 में जब प्यारेलाल सिर्फ उन्नीस साल के थे, उसी वक्त राजनांदगांव में सरस्वती वाचनालय की स्थापना की। वहां अखबार पढ़कर लोगों को देश की समस्याओं के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए उत्साहित किया जाता था।
  • सन् 1915 में प्यारेलालजी ने दुर्ग में वकालत आरम्भ की थी, पर सन् 1920 में जब नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने असहयोग आन्दोलन छेड़ने की घोषणा की तो ठाकुर प्यारेलाल ने अपनी वकालत छोड़ दी और जिले भर में असहयोग आन्दोलन का प्रचार करने निकल पड़े।
  • असहयोग आन्दोलन के दौरान न जाने कितने विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल छोड़ दिये, कितने वकीलों ने वकालत छोड़ दी। ठाकुर प्यारेलाल जी के भाईयों ने भी स्कूल छोड़ दिया। उन स्कूल छोड़े हुए विद्यार्थियों के लिये ठाकुर प्यारेलाल सोचने लगे कि क्या किया जाये। बाद में उन विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना की गई थी। प्यारेलाल जी ने खुद राजनांदगांव में एक माध्यामिक स्कूल की स्थापना की थी। धमतरी में राष्ट्रीय विद्यालय का दायित्व भी प्यारेलाल जी को सौंपा गया था। उनके पिता श्री दीनदयाल सिंह उन स्कूलों के डिपुटी इंस्पेक्टर थे जो राजनांदगांव, छुईखदान और कवर्धा रियासतों के थे।
  • ठाकुर प्यारेलाल वकालत छोड़ने के बाद गांव-गांव घूमकर चरखे और खादी का प्रचार करने लगे। प्रचार सिर्फ दूसरों के लिए नहीं था। प्रचार तोे अपने-आप के लिए भी था। ऐसा कहते हैं कि उन दिनों प्यारेलाल जी सिर्फ एक ही धोती पहनते थे। एक खादी की धोती। उसी को पहनकर स्नान करते, धोती का एक छोर पहने रहते, दूसरा छोर सुखाते, दूसरा छोर सूखाने पर उसे पहन लेते और पहला छोर सुखाते। तीन साल तक प्यारेलाल जी उसी धोती को पहनते रहे। ऐसे थे हमारे देश के लोग।
  • जब सन् 1923 में झंड़ा सत्याग्रह की घोषणा हुई तो दुर्ग में ठाकुर प्यारेलाल सत्याग्रहियों को संगठित करने लगे। कुछ ही समय के भीतर हजारों सत्याग्राही तैयार हो गये।
  • जब प्यारेलालजी गांव-गांव प्रचार कर रहे थे, उनकी माता की मृत्यु हो गई। ये खबर उन्हें छ: दिनों बाद मिली। घर लौटकर माता की क्रिया-कर्म समाप्त कर वे फिर से गांव-गांव घूमकर प्रचार करने लगे।
  • सन् 1924 में प्यारेलाल जी के नेतृत्व में मिल मजदूरों ने दूसरी बार राजनांदगांव में हड़ताल की। हड़ताली मजदूरों पर गोलियां भी चलीं। एक हड़ताली मजदूर शहीद हो गया और काफी मजदूर घायल हुए। जब ठाकुर प्यारेलाल वहाँ पहुँचे तो अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार करने का साहस नहीं किया पर ठाकुर प्यारेलाल को राजनांदगांव छोड़ने के लिये मजबूर करने लगे। पर ठाकुर प्यारेलाल कुछ और दिन राजनांदगांव में ही रहे। मजदूरों की मांगें पूरी होने के बाद ही राजनांदगांव छोड़ी।
  • सन् 1924 में महात्मा गाँधी जी ने सत्याग्रह स्थगित कर दिया था। इसीलिये ठाकुर प्यारेलाल रायपुर में रहकर फिर से वकालत करने लगे। रायपुर और दुर्ग जिले, दोनों उनके कार्यक्षेत्र हो गये।
  • सन् 1930 में बहिष्कार आन्दोलन के संचालन का भार ठाकुर प्यारेलाल जी को कांग्रेस ने सौंपा। प्यारेलाल जी खुद शराब की दुकानों पर पिकेटिंग करते थे।
  • जब सन् 1930 में उन्होंने किसानों को संगठित किया तो उन्हें एक साल की कठिन कारावास की सजा दी गई। पुन: सन् 1932 में जब रायपुर में गाँधी चौक के सामने वे भाषण दे रहे थे तो उन्हें फिर से गिरफ्तार कर दो साल के लिये जेल में डाल दिया गया। सन् 1932 में ठाकुर प्यारेलाल की वकालत की सनद छीनी गयी और जब उन्होंने जुर्माना देने से इन्कार किया तो उनके घर का सामान कुर्क कर दिया गया।
  • सन् 1934 में जेल से छूटते ही उन्हें महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का मंत्री चुन लिया गया। सन् 1936 में वे पहली बार असेम्बली के सदस्य चुने गये। गाँधी जी ने नई तालीम के बारे में विचार विमर्श के लिये उन्हें आमंत्रित किया था।
  • सन् 1936 में राजनांदगांव के मिल मजदूरों ने प्यारेलाल जी के नेतृत्व में फिर हड़ताल कर दी। इस बार अंग्रेज दीवान ने प्यारेलाल जी को राजनांदगांव की सीमा में प्रवेश निषेध का नोटिस दिया था। प्यारेलाल जी ने एक तरकीब निकाली। रेलवे प्लेटफार्म पर रहने लगे और नेतृत्व देते रहे। रेलवे प्लेटफार्म पर स्टेट का अधिकार नहीं था। अंग्रेज दीवान ने इसके बाद सरकार से लिखा-पढ़ी कर रेलवे प्लेटफार्म पर स्टेट का अधिकार करवाया। गाँधीजी ने इस हड़ताल में बहुत रुचि ली थी। बाद में राजनांदगांव मिल मजदूर आन्दोलन का नेतृत्व कामरेड रुईकरजी ने किया।
  • ठाकुर प्यारेलाल सिंह जी ने अकेले छत्तीसगढ़ में जितना कार्य किया, उतना कार्य बहुत संस्थाओं ने मिलकर भी नहीं किया। ऐसी थी उनकी कार्य-दक्षता।
  • सन् 1937 में ठाकुर प्यारेलाल का छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना में योगदान बहुत ही सराहनीय था। यह कॉलेज छत्तीसगढ़ में प्रथम कॉलेज था।
  • रायपुर नगर पालिका के ठाकुर प्यारेलाल लगातार तीन बार अध्यक्ष चुने गये। प्रथम बार सन् 1937 में, दूसरी बार सन् 1940 में और तीसरी बार सन् 1944 में। ठाकुर प्यारेलाल प्रचंड बहुमत से हर बार इसलिए चुने जाते थे क्योंकि उनके पास जनता का विश्वास, जनता का प्यार था। उस समय आज की तरह पैसा ही चुनाव लड़ने का साधन नहीं था। अध्यक्ष रहते हुए प्यारेलाल जी ने कई प्राइमरी स्कूल खोले, लड़कियों के लिये स्कूल खोले, दो नये अस्पताल खोले, सड़कों पर तारकोल बिछवाई, बहुत से कुंए खुदवाये।
  • सन् 1942 में प्यारेलाल जी के दोनों बेटे रामकृष्ण सिंह, सच्चिदानंद सिंह दो साल के लिए जेल गये। हरि ठाकुर, उनका छोटा पुत्र स्कूल छोड़कर गांव-गांव आन्दोलन का प्रचार कर रहा था।
  • सन् 1942 में एक घटना घटी थी जो ह्मदय को छू लेती है। पाँच क्रांतिकारी युवकों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। उनका अपराध था कि उन्होंने एक तहसीलदार साहब की हत्या की थी। युवकों को फांसी होने वाली थी। ठाकुर प्यारेलाल जी, तहसीलदार साहब, जो ईसाई थे, की पत्नी से मिले। उनकी पत्नी ने भारतीय सरकार को लिखा- “मेरे पति
  • 1942 के आंदोलन में मारे गये, यही ईश्वर को मंजूर था, इन युवकों को फाँसी पर लटकाने से मेरी तरह इनकी पत्नियाँ विधवा हो जायेगी, जो मेरी बहनों के समान हैं और जो मेरे ही समान निर्दोष हैं। इसलिये इन युवकों को सरकार प्राण दान दे।” – हरि ठाकुर “”जल जगंल जमीन के संघर्ष की शुरुआत””, रुपान्तर लेखमाला-3
  • सन् 1945 में प्यारेलाल जी ने छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ की नींव डाली और छत्तीसगढ़ के सभी जिले में बुनकरों की सहकारी संस्थाओं का निर्माण किया। इसके कारण अनगिनत बुनकर परिवार गरीबी से ऊपर उठे।
  • इसके बाद सन् 1944 में ठाकुर प्यारेलाल जी ने किसान सहकारी राईस मिल की महासमुंद में स्थापना में मदद की। इसके अलावा न जाने कितने संघों जैसे- धानी संघ, विश्वकर्मा संघ, ताम्रकार संघों का उन्होंने निर्माण किया।
  • सन् 1946 में ठाकुर प्यारेलाल जी ने छत्तीसगढ़ को सभी रियासतों में कांग्रेस की स्थापना की। सन् 1950 में वे आसाम गये वहां के छत्तीसगढियों की मदद करने के उद्देश्य से।
  • सन् 1950 में उन्होंने “राष्ट्र-बन्धु” (अर्ध-साप्ताहिक) का प्रकाशन आरंभ किया।
  • सन् 1951 को ठाकुर प्यारेलाल ने कांग्रेस से अपना त्याग पत्र दे दिया। अखिल भारतीय स्तर पर एक विशुद्ध गाँधीवादी संस्था के रुप में अखिल भारतीय किसान मज़दूर पार्टी के वे सदस्य थे। आचार्य कृपलानी इसके अध्यक्ष थे। बहुत कम समय के भीतर ही प्यारेलाल जी ने इतने अच्छे ढ़ंग से उस दल को संगठित किया कि सन् 51-52 के आम चुनाव (प्रथम) में इस दल को द्वितीय स्थान मिला। उसी पार्टी के टिकट पर प्यारेलाल जी सन् 1952 के आम चुनाव में रायपुर से फिर से विधान सभा (मध्य प्रदेश) के सदस्य चुने गये।
  • सन् 1950 में चुनाव के तुरन्त बाद ठाकुर जी आचार्य विनोबा के भूदान आन्दोलन में शामिल हो गये। न जाने कितने गांवों की उन्होंने पैदल यात्रा की। ऐसा कहते है कि मध्य प्रदेश का कोई हिस्सा नहीं छूटा। छत्तीसगढ़ के लोग उन्हें छत्तीसगढ़ का गाँधी कहने लगे थे। भूदान आन्दोलन में उन्होंने हजारों एकड़ भूमि एकत्र की और वितरण किया।
  • इन्हीं यात्राओं में एक पदयात्रा ठाकुर प्यारेलाल सिंह की अंतिम यात्रा साबित हुई। जब सन् 1954 को ठाकुर जी मध्य प्रदेश की पदयात्रा के लिये निकले तो उनका उद्देश्य था- 2200 मील की पदयात्रा साढ़े तीन महीनों में खत्म कर तीन सौ गांवों में आन्दोलन का संदेश पहुँचाना। 15 दिनों तक बारिश में ही उन्होंने पदयात्रा की। चलते वक्त जब उन्हें ह्मदय शूल का पहला दौरा पड़ा, तो उन्होंने उसे “मस्कुलर पेन” कहकर टाल दिया और चलते चले गये। दो घंटे तक पैदल चलते रहे, लोगों से बातचीत करते हुए, उन्हें आश्वासन देते हुए।
  • उसके बाद पड़ाव पर पहुंचकर 2 घंटे कार्यकर्ताओं से चर्चा करके, सम्मेलन में पहुंचकर उन्होंने डेढ़ घंटे तक भाषण दिया।
  • यही भाषण उनका अंतिम भाषण था। रात 9 बजे जब वे बिस्तर पर लेटे, हृदय शूल का पुन: दौरा पड़ा। वे समझ गये कि उनके पास और समय नहीं है, और वे राम नाम करते-करते चले गये।
  • 22 अक्टूबर, सन् 1954 को खारुन नदी के किनारे उनका दाह संस्कार हुआ। छत्तीसगढ़ के लोगों ने कहा कि छत्तीसगढ़ का गांधी चला गया।
  • ठाकुर प्यारेलाल सिंह के बारे में छत्तीसगढ़ में एक कहावत प्रचलित है –

” गरीबों का सहारा है, वही ठाकुर हमारा है “

3. पं. सुन्दरलाल शर्मा (Sundarlal Sharma)

  • राजिम के पास एक गांव है जिसका नाम है चमसुर। उसी चमसुर गांव में पं. सुन्दरलाल शर्मा का जन्म हुआ था। उनका जन्म विक्रम संवत 1938 की पौष कृष्ण अमावस्या अर्थात् 1881 ई० को हुआ था। इनके पिता थे पं. जयलाल तिवारी जो कांकेर रियासत में विधि सलाहकार थे, उनकी मां थीं देवमती देवी। पं. जयलाल तिवारी बहुत ज्ञानी एंव सज्जन व्यक्ति थे। कांकेर राजा ने उन्हें 18 गांव प्रदान किये थे।
  • पं. जयलाल तिवारी बहुत अच्छे कवि थे और संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा की परवरिश इसी प्रगतिशील परिवार में हुई। चमसुर गांव के मिडिल स्कूल तक सुन्दरलाल की पढ़ाई हुई थी। इसके बाद उनकी पढ़ाई घर पर ही हुई थी। उनके पिता ने उनकी उच्च शिक्षा की व्यवस्था बहुत ही अच्छे तरीके से घर पर ही कर दी थी। शिक्षक आते थे और सुन्दरलाल शर्मा ने शिक्षकों के सहारे घर पर ही अंग्रेजी, बंगला, उड़िया, मराठी भाषा का अध्ययन किया।
  • उनके घर में बहुत-सी पत्रिकाएँ आती थीं, जैसे- “केसरी” (जिसके सम्पादक थे लोकमान्य तिलक) “मराठा”। पत्रिकाओं के माध्यम से सुन्दरलाल शर्मा की सोचने की क्षमता बढ़ी। किसी भी विचारधारा को वे अच्छी तरह परखने के बाद ही अपनाने लगे। खुद लिखने भी लगे। कविताएँ लिखने लगे। उनकी कवितायें प्रकाशित भी होने लगीं। 1898 में उनकी कवितायें रसिक मित्र में प्रकाशित हुई।
  • सुन्दरलाल न केवल कवि थे, बल्कि चित्रकार भी थे। चित्रकार होने के साथ-साथ वे मूर्तिकार भी थे। नाटक भी लिखते थे। रंगमंच में उनकी गहरी रुचि थी। वे कहते थे कि नाटक के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।
    देश पराधीन है – यह बात उन्हें बहुत तकलीफ देती थी। इसलिए सन 1906 में वे पहुँचे सूरत जहाँ उन्होंने कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया। वहां तिलक उग्र (गरम) दल का नेतृत्व कर रहे थे। गोखले के साथ जो थे वे नरम दल की तरफ से तिलक का विरोध कर रहे थे।
  • सुन्दरलाल शर्मा और उनके साथी पं नारायण राव मेधावाले और डा. शिवराम गुंजे तिलकजी के साथ थे। सुन्दरलाल शर्मा ने सूरत कांग्रेस से लौटकर अपने सहयोगियों के साथ स्वदेशी वस्तुओं की दुकानें खोलीं। ये दुकानें राजिम, धमतरी और रायपुर में खोली गईं। इन दुकानों के माध्यम से वे स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार करने लगे। जो भी खरीदने के लिए आते, उन्हें बताया जाता कि उन्हें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए पर सन 1911 में हजारों रुपये का घाटा होने के बाद ये दुकानें बंद हो गयीं। सुन्दरलाल शर्मा और उनके सहयोगियों पर हजारों रुपयों का कर्ज हो गया।
  • पं. सुन्दरलाल शर्मा की पत्नी श्रीमती बोधनी बाई चुपचाप हर मुसीबत का सामना अपने पति के साथ करती रहीं। उनके दो पुत्र थे – नीलमणि और विद्याभूषण। नीलमणि ने बनारस से शिक्षा प्राप्त की। ऐसा कहा जाता है कि वे अपने पिता के गुणों के सच्चे उत्तराधिकारी थे। सन 1918 में उनका देहान्त हो गया।
  • पं. सुन्दरलाल शर्मा के जीवन पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा पर अपने-आप को सम्भालकर फिर से वे समाज के कार्य में कूद पड़े। सामाजिक वर्ण-व्यवस्था उनके मन को बहुत पीड़ा देती थी। सन 1918 में उन्होंने सतनामियों को जनेऊ पहनाया एवं उन्हें समाज में सवर्णों की बराबरी का दर्जा दिया। इसके बाद ब्राह्मण वर्ग उनका विरोध करने लगा। पर पं.
  • सुन्दरलाल शर्मा अपनी राह पर सर ऊँचा कर चलते चले गये, जब मंदिर में अस्पृश्यता के नाम पर लोगों को प्रवेश नहीं करने दिया जाता था, तब सुन्दरलाल शर्मा अत्यन्त व्यथित हो उठते। इसके विरोध में उन्होंने आन्दोलन चलाये। राजिम के राजीव लोचन मन्दिर में कहारों को प्रवेश दिलाने का आन्दोलन सन् 1918 में चलाया। सन् 1925 में राजिम के रामचन्द्र मन्दिर में हरिजनों के साथ प्रवेश किया।
  • पं. सुन्दरलाल शर्मा हमेशा कहते थे कि हमें समाज की बुराईयों को जल्द से जल्द दूर करने का प्रयास करना चाहिए। उनका यह कहना था कि बचपन से ही किताबें पढ़ने की आदत होनी चाहिय। सन् 1914 में राजिम में उन्होंने एक पुस्तकालय की स्थापना की थी।
  • महात्मा गाँधी सन 1920 में छतीसगढ़ आये थे। उनको प्रथम बार छतीसगढ़ लाने का श्रेय सुन्दरलाल शर्मा को ही है। उस वक्त कण्डेल गांव में छोटेलाल बाबू के नेतृत्व में नहर सत्याग्रह आरम्भ हुआ था। इसी सन्दर्भ में सुन्दरलाल शर्मा गाँधीजी को लेने गये ताकि नहर सत्याग्रह और भी प्रभावशाली हो। गाँधीजी आ रहे है – यह खबर पहुँचते ही नहर विभाग के अधिकारियों ने आन्दोलनकारियों की बात मान ली।
  • सन् 1922 में यह निश्चय किया गया कि जगंल से लकड़ी काटकर कानून का उल्लंधन कर सत्याग्रह आरम्भ किया जाये। इसी सन्दर्भ में पं. सुन्दरलाल शर्मा और नारायण राव मेधावाले सिहावा में गिरफ्तार कर लिये गये। दोनों को एक वर्ष की सजा देकर रायपुर जेल में रखा गया। जिस दिन सजा सुनाई गई, उस दिन रायपुर और धमतरी में पूरी हड़ताल रही।
  • सन् 1923 में जेल से छूटने के बाद सुन्दरलाल शर्मा और उनके सहयोगी काकीनाड़ा कांग्रेस अधिवेशन के लिये रवाना हए। यह पदयात्रा 700 मील की थी जो उन्होंने बीहड़ जगंलों के बीच से की। इस पदयात्रा के दौरान वे आदिवासियों के बहुत करीब आये।
  • हर साल कांग्रेस अधिवेशन में लगातार जाते रहे, और प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे।
  • सन् 1930 में सुन्दरलाल शर्मा को एक वर्ष की कठोर सजा दी गई- यह था धमतरी तहसील में जंगल सत्याग्रह के सन्दर्भ में। उसके बाद 1932 में 6 माह की सजा हुई। रायपुर में दुकान पर पिकेटिंग करते हुए गिरफ्तार हुए थे।
    सन् 1933 में जब गाँधीजी हरिजनोद्धार पर निकले थे, तो उन्होंने पं. सुन्दरलाल शर्मा को इस दिशा में अग्रणी बताया था।
  • पं. सुन्दरलाल शर्मा ने रायपुर में सतनामी आश्रम, राजिम में ब्रह्मचर्याश्रम और धमतरी में अनाथालय की स्थापना की थी।
    साहित्य के क्षेत्र में उनका अवदान लगभग 20 ग्रंथ के रुप में है जिनमें 4 नाटक, 2 उपन्यास और काव्य रचनाएँ हैं। उनकी “छत्तीसगढ़ी दानलीला” इस क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय है। कहा जाता है कि यह छत्तीसगढ़ी का प्रथम प्रबंध काव्य है।
  • पं. सुन्दरलाल शर्मा की योग्य पत्नी बोधनी बाई की सन 1929 में मृत्यु हो गई थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा जी का निधन 28 दिसम्बर 1940 को हो गया। उनके जैसे बहुमुखी प्रतिभा बहुत ही कम हैं।

4. पं.रविशंकर शुक्ल (Ravishankar Shukla)

  • मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे।
  • जन्म – सागर (मध्यप्रदेश)
  • 1912 में कान्यकुब्ज सभा की स्थापना की।
  • 1921- राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की ।
  • 1923 – रायपुर जिला परिषद के अध्यक्ष बताये गए।
  • 6 अप्रैल 1930 को रायपुर में सोडा व एच. सी.एल.की सहायता से नमक बनाकर कानून तोड़ा।
  • 1932 में द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन के डायरेक्टर ।
  • 1936 में महाकौशल नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया ।
  • 1940 – छग में प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही बनने का श्रेय प्राप्त है।
  • 1 नवंबर 1956 को नवगठित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बनने का श्रेय प्राप्त है।
  • छ:ग शासन द्वारा साम्प्रदायिक सौहार्द एवं सद्भावना हेतु पं.रविशंकर शुक्ल पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

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