छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम के प्रसिद्ध राजीवलोचन

छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम के प्रसिद्ध राजीवलोचन का मन्दिर चतुर्थाकार में बनाया गया था। उत्तर में तथा दक्षिण में प्रवेश द्वार बने हुए हैं। महामंडप के बीच में गरुड़ हाथ जोड़े खड़े हैं। गर्भगृह के द्वार पर बांये-दांये तथा ऊपर चित्रण है, जिस पर सर्पाकार मानव आकृति अंकित है एवं मिथुन की मूर्तियां हैं। पश्चात् गर्भगृह में राजिवलोचन अर्थात् विष्णु का विग्रह सिंहासन पर स्थित है। यह प्रतिमा काले पत्थर की बनी विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति है। जिसके हाथों में शंक, चक्र, गदा और पदम है जिसकी लोचन के नाम से पूजा होती है। मंदिर के दोनों दिशाओं में परिक्रमा पथ और भण्डार गृह बना हुआ है।

सन् 1819 में सोनाखान के जमींदार रामराय ने स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत की थी। रामराय, वीर नरायण सिंह के पिता थे। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सीमित शक्ति के कारण उनका विद्रोह लम्बे समय तक नहीं चल सका। पर रामराय ने उसी समय ईस्ट इंडिया कम्पनी की साम्राज्यवादी आकांक्षा को भांप लिया था। रामराय छत्तीसगढ़ इतिहास के सन्धि-युग की राजसी पुरुष थे।

छत्तीसगढ़ में रायपुर जिले के बलौदा बाजार तहसील में सोनाखान नाम की एक छोटी-सी जमींदारी के जमींदार थे हमारे रामराय। वे आदिवासी थे। उनके पूर्वज इस जमींदारी पर शासन करते चले आ रहे थे। छत्तीसगढ़ में पहले पहले कलचुरियों का शासन था। रामराय के पिता फतेनारायन सिंह के समय में नागपुर के भोंसले ने छत्तीसगढ़ के कलचुरियों पदच्यूत किया था। उस वक्त फतेनारायन सिंह ने भोंसले के शासन को स्वीकार नहीं किया था।

उसी तरह जब सन् 1818 में भोंसले शासन और ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच संधि के अनुसार छत्तीसगढ़ी की शासन व्यवस्था ईस्ट इंडिया कम्पनी को सौंप दी गई, तो हमारे रामराय ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। सोनाखान की जमींदारी की सीमा में उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के कानून तथा आदेशों का पालन करने से इंकार कर दिया। रामराय का प्रभाव सोनाखान जमींदारी और उसके बाहर भी था। उनका इतना ज्यादा प्रभाव था कि लोग उनके आदेश व इच्छा का उल्लंघन करने के लिये तैयार नहीं थे। लोगों का कहना था कि वे अंग्रेजी सत्ता के आदेश का तो उल्लंघन कर सकते हैं पर रामराय का नहीं। इसी कारण अंग्रेजी सत्ता उनसे डरती थी। और इसी कारण अंग्रेजों ने रामराय पर यह आरोप लगाना शुरु कर दिया कि रामराय आतंक फैला रहे हैं और वे उन लोगों को शरण दे रहे हैं जो अंग्रेजी सत्ता को नहीं मानते।

पर सत्य तो कुछ और ही था। रामराय के पूर्वजों की भूमि भोंसले और अंग्रेजों के समय उसके अधिकार से छीन ली गई थी उस भूमि को रामराय वापस लेने की चेष्टा कर रहे थे। इस घटना से पता चलता है कि रामराय कितने साहसी थे। अंग्रेजी सत्ता रामराय से डरती थी, और इसी डर के कारण सन् 1819 में अंग्रेजोंे ने सोनाखान पर आक्रमण कर दिया। उस वक्त रामराय को अपनी वृद्धावस्था के कारण पराजय स्वीकार करनी पड़ी। और संधि करने के सिवाय कोई चारा नहीं रहा।

अंग्रेजों ने संधि के बहाने सोनाखान जमींदारी की बहुत सारी जमीन हड़प ली। उनके अधिकार हड़प लिये। रामराय अन्तिम समय तक अपने बेटे नारायन सिंह को अपने पिता फतेनारायन सिंह के बारे में बताते रहे – फतेनारायन सिंह जिन्होंने भोंसले के शासन को कभी स्वीकार नहीं किया था। नारायन सिंह इसी स्वतंत्रता की भावना को लेकर सोनाखान के जमींदार बने।
नारायन सिंह अपने दादाजी फतेनारायन सिंह तथा पिताजी रामराय के जैसे लोकप्रिय हो गये। प्रजा के प्रति उनका अगाध प्रेम था। सबसे पहले वे प्रजा के बारे में सोचा करते थे।

वीर नारायण सिंह के बारे में

जब सन् 1795 ई. में नारायन सिंह बिंझावार का जन्म हुआ था। तो सोनाखान के आसपास के क्षेत्रों में भी लोगों ने खुशियाँ मनाई थीं। लोगों का यह विश्वास था कि फतेनारायन सिंह का पोता रामराय का बेटा प्रजा के लिये ही कार्य करेगा, प्रजा के हित के लिये ही हमेशा सोचेगा।

सन् 1856 ई. में छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जब भयंकर अकाल पड़ा, नारायन सिंह को यह देखकर बहुत ही अजीब लगा कि व्यापारियों ने अनाज दबाकर रख लिया था। उन्हें बहुत ही दुख हुआ कि लोग भूखों मर रहे हैं मगर व्यापारी सिर्फ पैसों के बारे में सोच रहे थे। तब नारायन सिंह ने एक व्यापारी के गोदाम का सारा अनाज किसानों को बांट दिया। अपनी इस कार्य की सूचना नारायन सिंह ने अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर को भी दे दी। अंग्रेजी सत्ता तो नारायन सिंह के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिये बहाना ढूंढ़ ही रही थी। जैसे ही व्यापारी ने शिकायत की, उनकी रिपोर्ट के आधार पर नारायन सिंह को 24 अक्टूबर 1856 ई. को सम्बलपुर में गिरफतार कर रायपुर जेल में डाल दिया गया। अंग्रेजी सत्ता ने वीर नारायण सिंह पर लूटपाट और डकैती का आरोप लगाया। अकालग्रस्त किसानों के बारे में सोचने वाला नारायण सिंह को जेल की कोठरी में बंद कर दिया गया और शोषक व्यापारियों को संरक्षण दिया गया।

सन् 1857 ई. की बात है। नारायण सिंह, जिन्हें लोग वीर नारायण सिंह के नाम से जानने लगे थे। रायपुर जेल में सजा काट रहे थे। सारे देश में अंग्रेजी सत्ता के विरोध में विद्रोह की भावना भड़क रही थी। मई 1857 में मेरठ में मंगल पाण्डे ने विद्रोह किया। अंग्रेजी फौज़ के हिन्दू और मुसलमान सैनिकों में विद्रोह की अग्नि धधक उठी थी। रायपुर के सैनिक मौका ढूँढ रहे थे और जब लोगों ने जेल में बन्द वीर नारायण सिंह को अपना नेता चुना तो सैनिकों ने उनकी हर संभव सहायता की। इसी तरह सैनिकों और जनता की सहायता से वीर नारायण सिंह 28 अगस्त सन् 1857 ई. को जेल से भाग निकले।

उस वक्त सम्बलपुर के क्रान्तिकारी सुरेन्द्र साय हजारीबाग जेल में थे। सुरेन्द्र साय 30 जुलाई 1857 को जेल से भाग निकले थे और उनके भाग निकलने के महज 28 दिनों बाद नारायण सिंह भी राजपुर जेल से भाग निकले। वीर नारायण सिंह रायपुर जेल से भागकर सोनाखान पहुँचे। सोनाखान की जनता वीर नारायण सिंह को देखकर खुशी से झूम उठी। जनता का मनोबल लौट आया। जनता अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति पाने के लिये कुछ भी करने को तैयार थी। महज मजबूत संगठन और कुशल नेतृत्व की जरुरत थी। नारायन सिंह के नेतृत्व में तुरन्त 500 सैनिकों की एक सेना बनाई गयी।

यह खबर जब रायपुर के डिप्टी कमिश्नर स्मिथ के पास पहुँची तो डर के मारे उसकी हालत खराब हो गई। उसने वीर नारायण सिंह के खिलाफ सैनिक कार्रवाई करने की तैयारी आरम्भ कर दी। लगभग 21 दिन इस तैयारी में लग गये। 20 नवम्बर 1857 ई. को सुबह अंग्रेजों की सेना सोनाखान के लिये चल पड़ी। यह सेना पहले खरोद पहुँची, खरोद जहाँ पुलिस थाना था। डिप्टी कमिशनर स्मिथ इतना डर गया था कि वहाँ पहुँचते ही कटंगी, भटगांव, बिलाईगड़ और देवरी के जमींदारों को उसने सहायता के लिये बुला भेजा। 26 नवम्बर को स्मिथ को नारायण सिंह का एक पत्र मिला जिसे उसने पास बैठे एक जमींदार से पढ़वाया। पढ़ते ही स्मिथ गुस्से से आग-बबूला हो उठा। 28 नवम्बर तक स्मिथ तैयारी करता रहा।

29 नवम्बर सुबह होते ही स्मिथ की फौज सोनाखान के लिए रवाना हो गई। स्मिथ इतना डरा हुआ था कि उसने रायपुर से जो सैनिक बुलवाये वे केवल अंग्रेज धुड़सवार थे। बिलासपुर से भी जो सैनिक बुलवाये गये थे, उनकी संख्या थी 50 और वे भी अंग्रेज ही थे। उनकी सेना में जो 80 बेलदार थे सिर्फ वे ही भारतवासी थे। इतना ही नहीं जैसे ही उन्हें पता चला कि उनका लक्ष्य सोनाखान पर आक्रमण करना है, उनमें से 30 बेलदारों ने सोनाखान जाने से मना कर दिया। पर इधर स्मिथ के दिमाग में कुछ और ही बात थी । जब अपनी फौज के साथ सोनाखान की बस्ती में जाकर उसने देखा कि सारा गाँव खाली पड़ा है तो उसने खाली घरों पर ही गोलियाँ चलवाई और उसके बाद मकानों में आग लगा दी गई । स्मिथ की क्रूरता को देखकर लोग चौंक उठे। सोनाखान धू-धूकर जल रहा था। सुबह तक सोनाखान राख के ढेर में बदल गया था ।

सोनाखान के मकानों में आग लगाकर स्मिथ जब अपने डेरे की ओर वापस जा रहा था, तभी एक पहाड़ी के पीछे से नारायण सिंह ने उस पर गोलियाँ बरसानी शुरु कर दी। पर स्मिथ बच निकला पर वह इतना डर गया था कि रात भर सो न सका ।

नारायण सिंह ने युद्ध क्षेत्र में स्मिथ से मुकाबले की सारी तैयारियाँ कर रखी थीं । इसीलिए तो वह “वीर” कहलाए। पर वीर नारायण सिंह ने अग्निकाण्ड की कल्पना नहीं की थी। सोनाखान, अपने प्रिय सोनाख़ान को राख के ढेर में बदलते देखा हमारे नारायण सिंह ने ।

दिनांक 2 दिसम्बर को कटंगी से अँग्रेज़ी फौज की सहायता आई। उस विशाल फौज की सहायता से स्मिथ ने पूरी पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया। खूब गोलियाँ चली किन्तु थोड़ी ही देर में नारायण सिंह की सेना की गोलियाँ खत्म हो गयी। अंत में, वीर नारायण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें रायपुर जेल में डाल दिया गया।

इतिहासकारों का यह मानना है कि यदि नारायण सिंह ने उस वक्त, जिस समय स्मिथ उसके ख़िलाफ़ फ़ौजी तैयारियाँ कर रहा था, आक्रमण कर दिया होता तो शायद एक भी अँग्रेज़ सैनिक जीवित नहीं बचता। पर वीर नारायण सिंह ने ऐसा नहीं किया।

30 नवम्बर की बात है। स्मिथ खरौद से खाना लेकर देवरी पहुँचा। देवरी का जमींदार रिश्ते में नारायण सिंह का काका लगता था। सोनाख़ान और देवरी के जमींदारों की खानदानी शत्रुता थी। वहाँ नारायण सिंह के बदले स्मिथ को पूरी मदद मिली। ऐसा लगता है कि हमारे देश में जयचदों और मीर जाफरों की कभी कमी नहीं रही है।

देवरी में रहकर स्मिथ ने सोनाखान की ओर जाने वाले सभी मार्गों को बन्द करने का प्रयास किया ताकि नारायण सिंह को बाहर से मदद मिल न सके। सोनाखान तो यों भी जंगलों और पहाड़ो से घिरा हुआ है।
1 दिसम्बर को स्मिथ देवरी से सोनाखान पर आक्रमण करने के लिए रवाना हुआ। देवरी के जमींदार स्मिथ और उसकी फौज का पथ प्रदर्शन कर रहे थे। सोनाखान से तीन फलार्ंग की दूरी पर एक नाले के पास वीर नारायण सिंह के सिपाहियों ने स्मिथ की सेना पर आक्रमण कर दिया। दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। वीर नारायण सिंह का आक्रमण इतना भयंकर था कि अँग्रेजी सेना को पीछे हटने के लिए विवश होना पड़ा, पर ठीक उसी समय स्मिथ की सेना की और मदद आ पहुँची। सेना की सँख्या बढ़ जाने से वे आगे बढ़ने लगे। उसे रोक पाना वीर नारायण की सेना के लिए कठिन हो गया। इसीलिए वीर नारायण सिंह अपनी सेना को लेकर जंगलों के अंदर जा छिपे और वहाँ से आक्रमण की योजना बनाने लगे।

स्मिथ की सेना थोड़ी देर इंतज़ार करती रही और उसके बाद सोनाखान की बस्ती में घुसकर ढ़ूढ़ने लगी लोगों को। गाँव में कोई भी नहीं था। गाँव खाली पड़ा था। नारायण सिंह ने पहले से ही लोगों को गाँव खाली करने के लिए कह रखा था। वे जानते थे कि स्मिथ में इन्सानियत नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं। बूढ़े बच्चों को भी वह छोड़ने वाला नहीं था। गाँव को खाली देखकर स्मिथ को इतना गुस्सा गाया कि उसने खाली घरों पर ही गोलियाँ चलानी शुरु कर दी थी। इसके बाद उसका गुस्सा बढ़ता गया और आखिर में उसने पूरे गाँव में आग लगवा दी।
नारायण सिंह और उसके साथी देख रहे थे – उनका प्यारा गाँव सोनाखान जल रहा था। वे सब वीर थे – उन्होंने तो स्मिथ से लड़ने की तैयारी की थी पर गाँव इस तरह जला दिया जाएगा, इसकी कल्पना उन्होंने नहीं की थी।
उधर स्मिथ के पास और भी रसद पहुँच रही थी और एक विशाल फौज़ भी पहुँची कटंगी से। अब उस विशाल फौज़ के सहारे पूरी पहाड़ी को घेर लिया गया। नारायण सिंह और उनके साथी वीरतापूर्वक गोलियाँ चला रहे थे पर कुछ देर बाद गोलियाँ खत्म हो गयी।

इसके बाद नारायण सिंह को गिरफ्तार कर रायपुर जेल में बन्द कर दिया गया।
रायपुर में उस जगह को अब जयस्तम्भ कहते है जहाँ वीर नारायण सिंह को फाँसी दी गई। सन् था 1857 , दिन था 10 दिसम्बर, इसी तरह हमारे छत्तीसगढ़ के वीर नारायण सिंह शहीद हो गए। ऐसा कहा जाता है कि नारायण सिंह को जिस दिन फाँसी दी गई, स्मिथ ने रायपुर फौज के सभी सिपाहियों को वहाँ रहने का आदेश दिया था। स्मिथ ने सोचा था कि वह दृश्य देखकर सिपाही लोग इतने डर जायेंगे कि विरोध करने के बारे में कभी नहीं सोचेंगे।

रायपुर में “जय स्तम्भ”कहने से हर कोई बता देगा वह कहाँ है। पर कितनों को उसके बारे में पता है, यह बात सोचने वाली है। क्या वहाँ से गुज़रने वालों को उस वीर के बारे में पता है? चारों ओर अब भीड़ है, आवाज़ है – उस शोरगुल के माहौल में “जयस्तम्भ” चुपचाप खड़ा है उस वीर की यादों को अपने भीतर समेटे।

 

महामण्डप बारह प्रस्तर खम्भों के सहारे बनाया गया है।

उत्तर दिशा में जो द्वार है वहां से बाहर निकलने से साक्षी गोपाल को देख सकते हैं। पश्चात् चारों ओर नृसिंह अवतार, बद्री अवतार, वामनावतार, वराह अवतार के मन्दिर हैं।

दूसरे परिसर में राजराजेश्वर, दान-दानेश्वर और राजिम भक्तिन तेलिन के मंदिर और सती माता का मंदिर है।

इसके बाद नदियों की ओर जाने का रास्ता है। यहां जो द्वार है वह पश्चिम दिशा का मुख्य एवं प्राचीन द्वार है। जिसके ऊपर राजिम का प्राचीन नाम कमलक्षेत्र पदमावती पुरि लिखा है।

नदी के किनारे भूतेश्वर व पंचेश्वर नाथ महादेव के मंदिर हैं और त्रिवेणी के बीच में कुलेश्वर नाथ महादेव का शिवलिंग स्थित है।

राजीवलोचन मंदिर यहां सभी मंदिरों से प्राचीन है। नल वंशी विलासतुंग के राजीवलोचन मंदिर अभिलेख के आधार पर इस मंदिर को 8 वीं शताब्दी का कहा गया है। इस अभिलेख में महाराजा विलासतुंग द्वारा विष्णु के मंदिर के निर्माण करने का वर्णन है।

राजीवलोचन की विग्रह मूर्ति के एक कोने में गजराज को अपनी सूंड में कमल नाल को पकड़े उत्कीर्ण दिखाया गया है। विष्णु की चतुर्भुज मूर्ति में गजराज के द्वारा कमल की भेंट और कहीं नहीं मिलती।

इसके बारे में जो कहानी प्रचलित है वह इस प्रकार है: ग्राह के द्वारा प्रातड़ित गजराज ने अपनी सूंड में कमल के फूल को पकड़कर राजीव लोचन को अर्पित किया था। इस कमल के फूल के माध्यम से गजराज ने अपनी सारी वेदना विष्णु भगवान के सामने निवेदित की थी। विष्णु जी उस समय विश्राम कर रहे थे। महालक्ष्मी उनके पैर दबा रही थीं। गजराज की पीड़ा को देखते ही भगवान ने तुरंत उठकर नंगे पैर दौड़ते हुए राजीव क्षेत्र में पहुंचकर गजराज की रक्षा की थी।

राजिम में कुलेश्वर से लगभग 100 गज की दूरी पर दक्षिण की ओर लोमश ॠषि का आश्रम है। यहां बेल के बहुत सारे पेड़ हैं, इसीलिए यह जगह बेलहारी के नाम से जानी जाती है। महर्षि लोमश ने शिव और विष्णु की एकरुपता स्थापित करते हुए हरिहर की उपासना का महामन्त्र दिया है। उन्होंने कहा है कि बिल्व पत्र में विष्णु की शक्ति को अंकित कर शिव को अर्पित करो। कुलेश्वर महादेव की अर्चना राजिम में आज भी इसी शैली में हुआ करती है। यह है छत्तीसगढ़ की धार्मिक सद्भाव का उदाहरण।